कोलकाता: बचपन में बच्चों के कोमल मन पर पड़ने वाला अत्यधिक दबाव उन्हें भयभीत और संकोची बना सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि जिन परिवारों में बच्चों पर हर समय डांट-फटकार या मारपीट का वातावरण रहता है, वहां बच्चे अक्सर सहमे हुए और अंतर्मुखी हो जाते हैं। वे अकेले रहना पसंद करते हैं और दूसरों से बातचीत करने में रुचि नहीं लेते।
बचपन में किसी भयानक घटना जैसे दुर्घटना, हिंसा या दुष्कर्म का अनुभव भी बच्चों के मन में गहरा डर बैठा सकता है। इसके अलावा डरावनी फिल्मों, कहानियों या स्कूल में साथियों द्वारा की जाने वाली बुलिंग का प्रभाव भी उनके व्यवहार पर पड़ता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चों को भयमुक्त रखने के लिए अभिभावकों को उनके साथ संवाद बढ़ाना चाहिए। केवल पढ़ाई का दबाव डालने के बजाय खेलकूद और रचनात्मक गतिविधियों के लिए भी समय देना जरूरी है। अच्छे कार्य पर बच्चों की प्रशंसा करने से उनका आत्मविश्वास बढ़ता है।
माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों के साथ स्नेहपूर्ण व्यवहार करें और छोटी-छोटी बातों पर दंड देने से बचें। प्रेरणादायक कहानियां सुनाना और समय-समय पर बाहर घुमाने ले जाना भी उनके मानसिक विकास में सहायक होता है। उचित मार्गदर्शन और प्रेमपूर्ण वातावरण से ही बच्चे साहसी और आत्मविश्वासी बन सकते हैं।










