कोलकाता: छोटे और सीमांत किसानों की आर्थिक आत्मनिर्भरता और सतत् आय वृद्धि के उद्देश्य से वैज्ञानिक पशुपालन और मत्स्य पालन को प्रभावी उपकरण के रूप में प्रस्तुत करने के लिए तीन दिवसीय मानव संसाधन विकास (एचआरडी) कार्यक्रम की शुरुआत की गई है। बदलते जलवायु परिस्थितियों, बढ़ती उत्पादन लागत और बाजार पर निर्भरता जैसी चुनौतियों के संदर्भ में इस प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रम का महत्व विशेषज्ञों के अनुसार विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य केवल आजीविका के दायरे को पार करना ही नहीं, बल्कि यह दिखाना है कि वैज्ञानिक पशुपालन और मत्स्य पालन के माध्यम से किसानों के लिए स्थायी और सतत् आय के मार्ग कैसे तैयार किए जा सकते हैं।
पशु और मत्स्य विज्ञान के प्रसार में महत्वपूर्ण इस कार्यक्रम का आयोजन वेस्ट बंगाल यूनिवर्सिटी ऑफ़ एनिमल एंड फिशरी साइंसेस (डब्ल्यूबीयुए एण्ड एफएस) के अधीन डाइरेक्टोरेट ऑफ़ रिसर्च, एक्सटेंशन एंड फार्म्स द्वारा किया गया। विश्वविद्यालय के फार्मर्स’ हॉस्टल में आयोजित इस कार्यक्रम में राज्य के विभिन्न हिस्सों से आए प्रशिक्षार्थी भाग ले रहे हैं।
सुबह बजे कार्यक्रम का शुभारंभ प्रोफेसर शुभाशिष बटवाल, डायरेक्टर, डाइरेक्टोरेट ऑफ़ रिसर्च, एक्सटेंशन एंड फार्म्स (डब्ल्यूबीयुए एण्ड एफएस) द्वारा पुष्पांजलि अर्पित कर और उत्तरीय प्रदान कर किया गया। अपने स्वागत भाषण में उन्होंने विश्वविद्यालय की किसान-केंद्रित शोध, विस्तार गतिविधियों और तकनीक को क्षेत्र स्तर पर पहुँचाने में इस प्रकार के प्रशिक्षण की भूमिका पर प्रकाश डाला।
इसके बाद विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार प्रोफेसर पार्थ दास ने कहा कि शैक्षणिक संस्थान और क्षेत्रीय कृषि एवं पशुपालन गतिविधियों के बीच समन्वय स्थापित करना आवश्यक है, क्योंकि यही समन्वय किसानों की वास्तविक समस्याओं का प्रभावी समाधान प्रदान कर सकता है।
कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में डॉ. प्रदीप दे, डायरेक्टर, आई कार- अटारी ज़ोन–५, कोलकाता ने मार्गदर्शक भाषण दिया। उन्होंने कृषि विज्ञान केंद्रों की भूमिका, आधुनिक तकनीक के प्रसार और प्रशिक्षण के माध्यम से किसानों की उत्पादन और आय वृद्धि के सफल अनुभव साझा किए।
विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि विश्वविद्यालय के माननीय उपकुलपति डॉ. टी. के. दत्त ने भी अपने भाषण में कहा, “वैज्ञानिक पशुपालन और मत्स्य पालन वर्तमान समय में ग्रामीण अर्थव्यवस्था के प्रमुख स्तंभों में से एक हैं। आधुनिक तकनीक, सही प्रबंधन और प्रशिक्षित मानव संसाधनों के माध्यम से छोटे और सीमांत किसानों की आय कई गुना बढ़ाई जा सकती है।” उन्होंने आगे कहा कि विश्वविद्यालय भविष्य में भी किसानों के हित में इस तरह के व्यावहारिक प्रशिक्षण कार्यक्रमों को विशेष महत्व देगा।
साथ ही डॉ. केशव चंद्र धारा ने अपने भाषण में रोग प्रबंधन, उन्नत जात चयन और संतुलित पोषण व्यवस्था की महत्ता पर जोर दिया। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि यह ज्ञान क्षेत्र स्तर पर कार्यरत तकनीशियनों के माध्यम से किसानों तक पहुँचाना अति आवश्यक है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के माननीय उपकुलपति डॉ. टी. के. दत्त ने की। उद्घाटन सत्र में धन्यवाद ज्ञापन डॉ. बिमल किनकर चंद, संयुक्त निदेशक, डाइरेक्टोरेट ऑफ़ रिसर्च, एक्सटेंशन एंड फार्म्स, डब्ल्यूबीयुए एण्ड एफएस ने किया।
इस तीन दिवसीय एचआरडी कार्यक्रम में राज्य के विभिन्न कृषि विज्ञान केंद्रों के वैज्ञानिक और अन्य तकनीकी कर्मी भाग ले रहे हैं। प्रशिक्षण सत्र में पशुपालन और मत्स्य पालन की आधुनिक तकनीक, रोग नियंत्रण, उत्पादन लागत कम करना, पोषण प्रबंधन और बाजार संपर्क जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तृत चर्चा की जाएगी।
विशेषज्ञों के अनुसार, इस तरह के प्रशिक्षण कार्यक्रम के माध्यम से क्षेत्र में कार्यरत तकनीशियन और अधिक कुशल बनेंगे, जिसका सीधा लाभ राज्य के लाखों छोटे और सीमांत किसानों तक पहुंचेगा। कुल मिलाकर, वैज्ञानिक पशुपालन और मत्स्य पालन के माध्यम से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को और मजबूत बनाने के लिए यह तीन दिवसीय कार्यक्रम एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।










