देवेन्द्र के. ढुंगाना
नेपाल में हाल ही में सम्पन्न हुए चुनाव परिणामों ने एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत दिया है—देश में लंबे समय से मजबूत मानी जाने वाली कम्युनिस्ट जनसमर्थन तेज़ी से घटता दिखाई दे रहा है। चुनाव से पहले लगभग ६५ प्रतिशत मत प्रभाव में माने जाने वाले वामपंथी शक्तियाँ अब लगभग १९–२० प्रतिशत के दायरे में सिमटती दिखाई दे रही हैं। यह केवल चुनावी गणित भर नहीं है, बल्कि नेपाली समाज में कम्युनिस्ट विचारधारा के प्रति बढ़ती निराशा और वितृष्णा का भी संकेत है।
नेपाल के आधुनिक राजनीतिक इतिहास में कम्युनिस्ट शक्तियों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जनआंदोलन से लेकर गणतंत्र की स्थापना तक के विभिन्न ऐतिहासिक मोड़ों पर वामपंथी दल निर्णायक शक्ति के रूप में उभरे। जनता ने उन्हें परिवर्तन के वाहक, समानता की आवाज़ और सामाजिक न्याय के पक्षधर के रूप में विश्वास किया। किंतु समय के साथ यह विश्वास धीरे-धीरे कमजोर पड़ता दिखाई दे रहा है।
कम्युनिस्ट जनमत के घटने का पहला कारण नेतृत्व का अहंकार और आंतरिक कलह है। नेकपा एमाले और माओवादी केंद्र के बीच पार्टी एकता के बाद दो-तिहाई बहुमत की सरकार बनना नेपाल के राजनीतिक इतिहास का एक दुर्लभ अवसर था। जनता ने स्थिरता, विकास और सुशासन की उम्मीद की थी। लेकिन इस अवसर को नेतृत्व की व्यक्तिगत प्रतिस्पर्धा, शक्ति संघर्ष और अहंकार ने नष्ट कर दिया। पार्टी एकता टूट गई, सरकार गिर गई और जनता में निराशा फैल गई। इससे कम्युनिस्ट नेतृत्व के प्रति विश्वास कमजोर हुआ।
दूसरा कारण कम्युनिस्ट शक्तियों के व्यवहारिक रूपांतरण में आया विचलन है। जो दल कभी स्वयं को क्रांति और परिवर्तन का पक्षधर बताते थे, सत्ता में पहुँचने के बाद वही यथास्थितिवाद के संरक्षक जैसे दिखाई देने लगे। विशेष रूप से युवाओं के आंदोलनों और सामाजिक असंतोष के मुद्दों पर राज्य द्वारा अपनाए गए दमनकारी रवैये ने कम्युनिस्ट सरकार को ही दमनकारी शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया। इससे युवाओं के बीच गहरी निराशा पैदा हुई।
तीसरा कारण वैचारिक संकट है। शीतयुद्ध की समाप्ति के बाद विश्व राजनीति में कम्युनिस्ट विचारधारा स्वयं पुनर्विचार के दौर में पहुँची थी। मार्क्स, लेनिन और माओ के सिद्धांत ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहे हैं, लेकिन २१वीं सदी की जटिल आर्थिक और सामाजिक संरचना में उनका प्रत्यक्ष प्रयोग चुनौतीपूर्ण हो गया है। दुनिया के कई कम्युनिस्ट दलों ने अपने विचारों को परिमार्जित करते हुए नए सामाजिक-आर्थिक कार्यक्रम प्रस्तुत करने की कोशिश की है। लेकिन नेपाल के कई वामपंथी दल अब भी पुराने नारों में ही अटके हुए दिखाई देते हैं। नई पीढ़ी को आकर्षित करने वाला आधुनिक राजनीतिक नैरेटिव तैयार न कर पाना उनकी बड़ी कमजोरी बन गया है।
भक्तपुर में नेपाल मजदूर किसान पार्टी की हार भी इसी प्रवृत्ति को उजागर करती है। लंबे समय तक भक्तपुर की राजनीति में केंद्रीय भूमिका निभाने वाली नेमकिपा अपने संगठनात्मक अनुशासन, भ्रष्टाचार-विरोधी छवि और स्थानीय विकास के कारण जानी जाती थी। लेकिन परिवर्तन की आकांक्षा और तेज़ी से बढ़ते शहरीकरण ने वहाँ की सामाजिक संरचना को बदल दिया है। नई आबादी, नई प्राथमिकताएँ और नई सोच के साथ तालमेल न बैठा पाने के कारण उसका पारंपरिक राजनीतिक आधार कमजोर पड़ता दिखाई देता है।
शहरीकरण, पलायन और सूचना प्रौद्योगिकी के विस्तार ने नेपाली समाज को तेज़ी से बदल दिया है। आज का मतदाता केवल वैचारिक नारों से प्रभावित नहीं होता; वह परिणाम, पारदर्शिता और भविष्य की स्पष्ट दृष्टि चाहता है। यदि राजनीतिक दल इस परिवर्तन को समझने में असफल होते हैं, तो वे इतिहास की स्मृति तक सीमित हो जाने के खतरे में पड़ सकते हैं।
फिर भी, केवल एक चुनावी हार के आधार पर किसी भी राजनीतिक विचारधारा के अंत की घोषणा करना जल्दबाज़ी होगी। राजनीतिक इतिहास बताता है कि दल संकट के दौर से पुनर्जन्म भी ले सकते हैं। लेकिन इसके लिए गंभीर आत्मसमीक्षा, नेतृत्व परिवर्तन, वैचारिक नविकरण और जनता के साथ संबंधों की पुनर्स्थापना आवश्यक होती है।
नेपाल के कम्युनिस्ट दल आज ठीक उसी मोड़ पर खड़े हैं। वे केवल अपने अतीत के इतिहास के सहारे टिके नहीं रह सकते। इतिहास के ब्याज पर राजनीति कुछ समय तक चल सकती है, लेकिन दीर्घकालिक भविष्य के लिए नए विचार, नया नेतृत्व और नई राजनीतिक संस्कृति आवश्यक है।
यदि कम्युनिस्ट शक्तियाँ इस संदेश को समझ सकीं, तो उनका पुनरुत्थान संभव है। लेकिन यदि वे पुराने तरीकों, पुराने विवादों और पुराने नारों में ही सीमित रहीं, तो नेपाल की राजनीति धीरे-धीरे नई शक्तियों के हाथों में खिसकती चली जाएगी।
इसलिए आज घटता हुआ जनमत केवल हार का विवरण नहीं है, यह कम्युनिस्ट आंदोलन के लिए एक गंभीर चेतावनी भी है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार तथा नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के केंद्रीय सदस्य हैं।)










