मौत की सज़ा पर बढ़ती राजनीतिक गर्मी
बांग्लादेश के अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण (आईसीटी) द्वारा अपदस्थ पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को सुनाई गई मौत की सज़ा पर भारत ने संयमित प्रतिक्रिया दी है। विश्लेषकों का मानना है कि इस फैसले से ढाका–दिल्ली संबंधों में तनाव बढ़ सकता है।
फैसला आने के तुरंत बाद बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय ने भारत से हसीना को ‘सुपुर्द’ करने का अनुरोध किया। भारत ने कुछ घंटों बाद अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि वह स्थिति का अध्ययन कर रहा है और पड़ोसी देश में शांति, लोकतंत्र और स्थिरता के पक्ष में है।
७८ वर्षीय हसीना पिछले वर्ष अगस्त में हुए हिंसक प्रदर्शनों के बाद भारत आई थीं और तभी से वहीं रह रही हैं। आईसीटी ने छात्र विद्रोह के दौरान मानवता विरोधी अपराध के आरोप में उन्हें और पूर्व गृह मंत्री असदुज्जमान खान कमाल को मौत की सज़ा सुनाई है। कमाल भी भारत में मौजूद बताए जाते हैं।
क्या भारत बाध्य है?
साल २०११ में भारत–बांग्लादेश के बीच हुए प्रत्यर्पण समझौते के अनुसार, राजनीतिक उद्देश्य की आशंका होने पर भारत किसी भी अनुरोध को ठुकरा सकता है।
समझौते की धारा ६ राजनीतिक कारणों पर आधारित मामलों में ‘छूट’ देती है, जबकि धारा ८ में कहा गया है कि यदि किसी को दमन या अन्यायपूर्ण ढंग से दंडित किया गया हो, तो प्रत्यर्पण न करने का प्रावधान है।
अवामी लीग की प्रतिक्रिया:
हसीना की पार्टी अवामी लीग ने इस फैसले को ‘दुर्भावनापूर्ण और बदले की कार्रवाई’ बताया है। पार्टी ने देशव्यापी आंदोलन और विरोध कार्यक्रमों की घोषणा की है।
उन्होंने न्यायाधिकरण और मौजूदा ‘अनिर्वाचित सरकार’ की वैधता पर भी सवाल उठाए हैं।
हसीना ने भी इस फैसले को राजनीतिक रूप से प्रेरित बताते हुए कहा कि यह एक ‘ग़ैर-अधिकृत न्यायाधिकरण’ का निर्णय है।
कानूनी विकल्प:
बांग्लादेशी कानून के मुताबिक हसीना सुप्रीम कोर्ट में अपील कर सकती हैं, लेकिन इसके लिए उन्हें ३० दिनों के भीतर देश लौटना होगा।
उनके बेटे ने कहा है कि अपील तभी होगी जब देश में ‘लोकतांत्रिक सरकार’ स्थापित हो जाएगी।
मौत की सज़ा लागू होगी?
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय ने फैसले पर गंभीर चिंता जताते हुए कहा कि हसीना का दोषी ठहराया जाना पीड़ितों के लिए अहम है, लेकिन संगठन ने हर परिस्थिति में मौत की सज़ा का विरोध दोहराया।
इतिहास में कई नेताओं को मौत की सज़ा या कड़ी सज़ा मिली है, लेकिन हसीना के मामले में राजनीतिक प्रतिशोध और सत्ता संघर्ष के आरोप लगातार तेज़ हो रहे हैं।











