क्या ऋण परियोजनाओं में विश्व स्तर पर पहले स्थान पर भारत?

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नई दिल्ली: पिछले दस वर्षों में ऋण परियोजनाओं के लिहाज़ से भारत दुनिया में पहला स्थान लेने की तैयारी में है। विश्व बैंक समूह की हालिया वार्षिक रिपोर्ट में भारत के लिए २.३ अरब अमेरिकी डॉलर की प्रतिबद्धता का उल्लेख किया गया है, जो रोजगार सृजन और आर्थिक वृद्धि को बढ़ावा देने के उद्देश्य से बुनियादी ढाँचा, ऊर्जा और निजी क्षेत्र के विकास पर केंद्रित है।
इसी के साथ, भारत के लिए “कंट्री पार्टनरशिप फ्रेमवर्क” के तहत विश्व बैंक ने करीब २७.१ अरब डॉलर का ऋण उपलब्ध कराया है, जिससे भारत आईबीआरडी सहायता का सबसे बड़ा लाभार्थी देश बन गया है। विश्व बैंक ने वित्त वर्ष २०२५ के लिए भारत को २.३ अरब डॉलर का ऋण देने की प्रतिबद्धता जताई है। हालिया वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार बैंक ने लगभग १९ हजार करोड़ रुपये का ऋण देने का आश्वासन दिया है।
६२ वर्ष में पहली बार भारत ने विश्व बैंक का सारा ऋण चुका दिया है—ऐसा दावा किया गया था; लेकिन यह दावा सही नहीं है। विश्व बैंक के आँकड़ों के अनुसार अभी भी भारत पर लगभग १५ अरब अमेरिकी डॉलर का बकाया है।
विश्व बैंक के अंतर्गत दो संस्थाएँ हैं:
इंटरनेशनल बैंक ऑफ रिकंस्ट्रक्शन एंड डेवलपमेंट (आईबीआरडी) यह मध्यम और निम्न-आय वाले देशों को ऋण देता है।
इंटरनेशनल डेवलपमेंट एसोसिएशन ( आइडिए), यह अत्यंत गरीब देशों को बिना ब्याज के ऋण या अनुदान प्रदान करती है।
आईबीआरडी की सूची के अनुसार भारत के विभिन्न सरकारी निकायों ने १२३ प्रकार के ऋण लिए हैं, कुछ पूरे हो चुके हैं, कुछ चालू हैं और कुछ की किस्तें चुकाई जा रही हैं। इन सभी को जोड़ने पर आईबीआरडी के साथ भारत का बकाया १४.५८ अरब डॉलर होता है (रद्द या चुका दिए गए ऋणों को छोड़कर)।
मुख्य ऋणग्राही कंट्रोलर ऑफ एड, अकाउंट्स एंड ऑडिट (सिएए एण्ड ए) है जो वित्त मंत्रालय के आर्थिक मामलों के विभाग के अंतर्गत आता है। यही संस्था ऋणदाताओं से समन्वय करती है और समय पर किस्तों के भुगतान को सुनिश्चित करती है। इसके अलावा भारतीय स्टेट बैंक, पावर ग्रिड कॉरपोरेशन, रिन्यूएबल एनर्जी डेवलपमेंट एजेंसी आदि ने भी ऋण लिया है।
इन सभी ऋणों में से १२.५ अरब डॉलर अब भी वितरण होना बाकी है। यह आँकड़ा ८ मई २०१९ तक अद्यतन किया गया था।
आइडिए से भारत ने २३ ऋण खातों के माध्यम से करीब 1 अरब डॉलर का ऋण लिया है। २.६ अरब डॉलर अभी वितरण शेष है, और २५०–२५० मिलियन डॉलर के दो ऋण स्वीकृत हो चुके हैं।
दूसरी ओर, पाकिस्तान ने आइएमएफ से अब तक ७.७२ अरब डॉलर से अधिक का ऋण लिया है, यह बात संघीय वित्त मंत्रालय की रिपोर्ट में दर्ज है।
विश्व बैंक केवल योग्य देशों को ही ऋण देता है और यह धनराशि सड़क, सिंचाई, सामाजिक बुनियादी ढाँचा, आपदा प्रबंधन, स्वच्छ ऊर्जा आदि क्षेत्रों में निवेश की जाती है। भारत के लिए स्वीकृत परियोजनाओं में राजस्थान में सड़कें, आंध्र प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाएँ, सौर एवं हाइब्रिड ऊर्जा, और उत्तर प्रदेश में सड़क विस्तार जैसी योजनाएँ शामिल हैं।
विश्व बैंक ने २.३ अरब डॉलर की जिस प्रतिबद्धता का उल्लेख किया है, उसका उद्देश्य बुनियादी ढाँचे, ऊर्जा और निजी निवेश के प्रवाह को सुदृढ़ कर भारत की विकास प्राथमिकताओं को समर्थन देना है। वित्त वर्ष २०२५ के लिए भारत को आईबीआरडी के शीर्ष दस ऋणग्राहियों में से एक के रूप में चिह्नित किया गया है।
विश्व बैंक समूह की रणनीति तीन स्तंभों पर आधारित है।
रोजगार सृजन में सहायक बुनियादी ढाँचा, शासन और नियामकीय वातावरण का सुदृढ़ीकरण, निजी पूँजी का अधिक प्रभावी संप्रेषण, इससे उम्मीद है कि भारत में युवाओं-केंद्रित रोज़गार चुनौतियों के समाधान में मदद मिलेगी।
आइएफसी (विश्व बैंक समूह की निजी क्षेत्र शाखा) ने निजी इक्विटी और वेंचर कैपिटल को सहयोग देकर लाखों नौकरियाँ और व्यवसाय सृजित करने में भूमिका निभाई है। उदाहरण के तौर पर, बस्तु हाउसिंग फाइनेंस, जिसके ६०% ऋणग्राही स्व-रोज़गार वाले हैं। आइएफसी के निवेश के बाद तकनीक का बेहतर उपयोग कर सेवाओं का विस्तार करने में सफल रही।
पिछले दो वर्षों में आईबीआरडी – आइडिए परियोजनाओं की स्वीकृति का समय १९ महीनों से घटकर १३ महीने रह गया है; कुछ परियोजनाएँ तो ३० दिनों में ही आगे बढ़ सकीं, जिससे भारत को तेज़ आर्थिक सहायता पहुँचाने का लक्ष्य साधा जा रहा है।
विश्व बैंक कोई अलग “प्रधानमंत्री लोन” नहीं देता बल्कि देश की आवश्यकता के अनुसार विभिन्न मंत्रालयों या परियोजनाओं के लिए ऋण स्वीकृत करता है। ऋण की राशि देश की आर्थिक स्थिति और परियोजना की माँग के अनुसार बदलती रहती है।
भारत के सरकारी ऋण में २०२२–२३ के दौरान आंतरिक ऋण लगभग ११.९५ ट्रिलियन रुपये था। बाहरी ऋण समय के साथ बदलता है। २०२१ में यह करीब ४.२० ट्रिलियन डॉलर था।
विश्व बैंक ने भारत को २७.१ अरब डॉलर की सहायता दी है। साथ ही मुद्रा योजना, पीएम-स्वनिधि, पीएम-विश्वकर्मा जैसी योजनाओं के माध्यम से सूक्ष्म ऋण और स्वरोजगार कार्यक्रम संचालित किए जा रहे हैं।
संक्षेप में, विश्व बैंक की भूमिका विकास सहयोग प्रदान करना है, जबकि आइएमएफ वैश्विक वित्तीय स्थिरता पर ध्यान देता है। १९९१ में आइएमएफ ने भारत को संकट से उबारा था, और २०२५ के लिए विश्व बैंक ने फिर से २.३ अरब डॉलर के ऋण की प्रतिबद्धता जताई है।

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