ईंधन महंगाई का बहाना, बाज़ार में लूटतंत्र..सरकार क्यों मौन?

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भद्रपुर(देशबन्धु क्षेत्री): विश्व अर्थव्यवस्था इस समय अस्थिरता के दौर से गुजर रही है। पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष, आपूर्ति श्रृंखला में बाधाएं और कच्चे तेल की कीमतों में तीव्र उतार-चढ़ाव ने वैश्विक बाज़ार को प्रभावित किया है। इसका सीधा असर नेपाल जैसे आयात-निर्भर अर्थतंत्र पर पड़ना स्वाभाविक है। लेकिन सवाल यह है—अंतरराष्ट्रीय कारणों से शुरू हुई महंगाई नेपाल में आकर कालाबाज़ारी और मनमाने मूल्य निर्धारण में क्यों बदल जाती है?
नेपाल में पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में लगातार वृद्धि के बाद इसका असर परिवहन, उत्पादन और दैनिक उपभोग की वस्तुओं पर दिखने लगा है। लेकिन यह प्रभाव ‘स्वाभाविक’ सीमा से काफी आगे बढ़ चुका है। बाज़ार में खाद्य तेल, सब्ज़ियां, सीमेंट, सरिया से लेकर कपड़ों तक की कीमतों में असामान्य वृद्धि केवल लागत बढ़ने का परिणाम नहीं, बल्कि नियमन की कमजोरी और अवसरवादी प्रवृत्ति का स्पष्ट उदाहरण है।
और भी चिंताजनक बात यह है कि परिवहन किराया औपचारिक रूप से समायोजित होने से पहले ही व्यापारियों ने वस्तुओं के दाम बढ़ा दिए हैं। इससे साफ है कि बाज़ार में अनुमान के आधार पर मूल्य बढ़ाने की प्रवृत्ति हावी हो चुकी है। इतना ही नहीं, पहले से कम कीमत पर खरीदे गए और गोदाम में रखे सामान को भी नई कीमत पर बेचना खुली कालाबाज़ारी है। ऐसे में सरकार की भूमिका केवल दर्शक जैसी दिखाई देना गंभीर चिंता का विषय है।
सरकार बाज़ार अनुगमन के लिए सैकड़ों निरीक्षण अधिकारियों की तैनाती का दावा करती है, लेकिन उपभोक्ताओं का अनुभव इसके विपरीत है। अनुगमन ‘औपचारिकता’ मात्र बनकर रह गया है। यदि अनुगमन प्रभावी होता, तो बाज़ार में इस तरह की खुली मूल्यवृद्धि और कृत्रिम अभाव संभव नहीं होता। असली समस्या प्रणालीगत है—जहां न तो वस्तुओं के मूल्य का कोई स्पष्ट मानदंड है और न ही मुनाफे की कोई सीमा तय है।
इसी बीच, नेपाल ऑयल निगम का ‘मूल्य स्थिरीकरण कोष’ सबसे विवादित विषय बन गया है। इस कोष में २० अरब रुपये से अधिक राशि होने के बावजूद सरकार ने उपभोक्ताओं को राहत देने के बजाय सीधे कीमतें बढ़ा दीं। ऐसे में उपभोक्ता अधिकार कार्यकर्ताओं द्वारा सरकार की नीयत पर सवाल उठाना स्वाभाविक है। यदि अंतरराष्ट्रीय बाज़ार के मामूली उतार-चढ़ाव का बोझ भी उपभोक्ताओं को ही उठाना पड़े, तो इस कोष का औचित्य क्या रह जाता है?
बाज़ार में कालाबाज़ारी केवल आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि सुशासन की विफलता भी है। मूल्य वृद्धि की पूर्व सूचना पाकर डिपो खाली करना, कृत्रिम अभाव पैदा करना और फिर ऊंचे दाम पर बिक्री करना—ये सब संकेत हैं कि कहीं न कहीं नियामक निकाय और व्यापारियों के बीच की दूरी खतरनाक रूप से कम हो गई है। ऐसे मामलों में कड़ी जांच और कार्रवाई न होने से गलत संदेश जाता है- “नियम तोड़कर मुनाफा कमाना ठीक है।”
सरकार फिलहाल विभिन्न विकल्पों पर चर्चा करने की बात कह रही है। अनुगमन बढ़ाने, कृत्रिम अभाव रोकने और राहत उपाय खोजने के प्रयास सकारात्मक लगते हैं, लेकिन समस्या चर्चा में नहीं, बल्कि क्रियान्वयन में है। जब तक बाज़ार में ‘शून्य सहनशीलता’ की नीति लागू नहीं होती, तब तक ये घोषणाएं कागज़ तक ही सीमित रहेंगी।
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम २०७५ बि. स.में उपभोक्ता अदालत का स्पष्ट प्रावधान है, लेकिन वर्षों बाद भी इसका क्रियान्वयन न होना सरकार की प्राथमिकताओं पर सवाल खड़ा करता है। जब उपभोक्ताओं के लिए त्वरित न्याय की व्यवस्था ही नहीं होगी, तो बाज़ार में अनुशासन कैसे स्थापित होगा?
दीर्घकालिक समाधान के रूप में नेपाल को पेट्रोलियम पर अपनी निर्भरता कम करनी होगी। जलविद्युत की अपार संभावनाएं होने के बावजूद उसका समुचित उपयोग नहीं हो पाया है। विद्युत वाहनों, वैकल्पिक ऊर्जा और ऊर्जा विविधीकरण पर जोर देना समय की मांग है। लेकिन इन नीतियों को लागू करने के लिए सरकार को खुद उदाहरण प्रस्तुत करना होगा।
अंततः सबसे बड़ा सवाल यही है- क्या सरकार उपभोक्ताओं के पक्ष में है या बिचौलियों के? यदि मूल्य स्थिरीकरण कोष का उपयोग नहीं होता, अनुगमन प्रभावी नहीं होता और दोषियों को सज़ा नहीं मिलती, तो जनता का सरकार पर भरोसा और कमजोर होता जाएगा।
नेपाल अकेले ईंधन की वैश्विक कीमतों को नियंत्रित नहीं कर सकता, लेकिन उसके बहाने होने वाली लूट को रोकना पूरी तरह संभव है, यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति हो। आज की चुनौती महंगाई नहीं, बल्कि उसका प्रबंधन है, और इसी प्रबंधन में सरकार विफल होती दिख रही है।
अब भी समय है, सरकार ठोस कदम उठाए, बाज़ार को अनुशासित बनाए और उपभोक्ताओं को राहत दे। अन्यथा, महंगाई के साथ-साथ अविश्वास की आग भी तेजी से फैलती जाएगी।

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