देवेंद्र के. ढुंगाना
भारत का उत्तर–पूर्वी क्षेत्र प्राकृतिक दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील भूभाग है। घनी वर्षा, पहाड़ी भौगोलिक संरचना, कमजोर आधारभूत संरचना और जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों ने इस क्षेत्र को बार-बार आपदाओं के जोखिम में डाल दिया है। ऐसे संदर्भ में मेघालय सरकार द्वारा राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल (एसडीआरएफ) की दो नई बटालियन स्थापित करते हुए ७०० से अधिक जनशक्ति जोड़ने का निर्णय केवल प्रशासनिक विस्तार नहीं, बल्कि दूरदर्शी नीति और व्यावहारिक सोच का उदाहरण है।
मेघालय जैसे राज्य में, जहाँ भूस्खलन, आकस्मिक बाढ़ और वर्षाजनित आपदाएँ लगभग सामान्य बन चुकी हैं, वहाँ आपदा प्रबंधन को प्रतिक्रियात्मक के बजाय पूर्व-तैयारी आधारित बनाना आवश्यक था। इसी आवश्यकता को पहचानते हुए सरकार ने एसडीआरएफ के संरचनात्मक विस्तार की दिशा में कदम उठाया है। प्रत्येक बटालियन में ३५४ कर्मियों की व्यवस्था करते हुए कुल ७०८ जनशक्ति तैयार करना और उन्हें गारो हिल्स तथा शिलांग–जैंतिया हिल्स जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में तैनात करने की योजना, भौगोलिक संतुलन और पहुँच—दोनों दृष्टियों से उपयुक्त प्रतीत होती है।
इस पहल का एक और महत्वपूर्ण पहलू संसाधनों का पुनर्संयोजन है। सीमावर्ती होम गार्ड्स बटालियन को समाहित कर एसडीआरएफ का गठन करना इस बात का संकेत है कि सरकार उपलब्ध जनशक्ति और संसाधनों का अधिकतम उपयोग करना चाहती है, बिना नए ढाँचे पर अत्यधिक खर्च किए। दक्षिण एशियाई प्रशासनिक परिप्रेक्ष्य में यह दृष्टिकोण अभी भी दुर्लभ है, जहाँ अक्सर नई संरचनाओं के निर्माण में पुराने तंत्रों की अनदेखी कर दी जाती है। मेघालय का यह कदम “संसाधनों के स्मार्ट उपयोग” की अवधारणा को व्यवहार में उतारता है।
आपदा प्रबंधन में समय सबसे महत्वपूर्ण कारक होता है। दुर्घटना के बाद शुरुआती कुछ घंटों में किया गया बचाव कार्य जीवन और मृत्यु के बीच का अंतर तय करता है। इस संदर्भ में एसडीआरएफ की नई बटालियनों की रणनीतिक तैनाती प्रतिक्रिया समय को कम करेगी, जिससे सीधे तौर पर मानवीय क्षति में कमी आएगी। साथ ही, आधुनिक बचाव उपकरणों और विशेष प्रशिक्षण की व्यवस्था की घोषणा यह भी दर्शाती है कि सरकार केवल संख्या बढ़ाने पर नहीं, बल्कि गुणवत्ता सुधार पर भी ध्यान दे रही है।
इस कदम को केवल एक राज्य की आंतरिक नीति तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए। यह व्यापक संदेश देता है—विशेषकर नेपाल जैसे देशों के लिए, जहाँ समान भौगोलिक चुनौतियाँ मौजूद हैं। नेपाल में भी भूकंप, बाढ़ और भूस्खलन जैसी आपदाएँ बार-बार सामने आती हैं, लेकिन अब भी स्थानीय स्तर पर त्वरित प्रतिक्रिया देने वाली संरचनाएँ पर्याप्त रूप से विकसित नहीं हो पाई हैं। केंद्रीय स्तर पर योजनाएँ बनती हैं, परंतु उनका प्रभावी क्रियान्वयन स्थानीय स्तर पर कमजोर रहता है—यह एक दीर्घकालिक समस्या है।
मेघालय का अनुभव स्पष्ट करता है कि आपदा प्रबंधन केवल नीतिगत दस्तावेजों तक सीमित नहीं रहना चाहिए; इसे संस्थागत ढाँचे, प्रशिक्षित जनशक्ति और क्षेत्रीय तैनाती से जोड़ना आवश्यक है। एसडीआरएफ की शुरुआत वर्ष २०१४ में एक कंपनी के रूप में हुई थी और आज यह दो पूर्ण बटालियनों में विकसित हो चुकी है, यह निरंतरता और क्रमिक विकास के महत्व को रेखांकित करता है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि छोटी शुरुआत को सही दिशा मिले तो दीर्घकाल में प्रभावी प्रणाली विकसित की जा सकती है।
इसी प्रकार, मेघालय सचिवालय होम गार्ड्स को “मेघालय औद्योगिक सुरक्षा बल (एमआईएसएफ)” में परिवर्तित करने का निर्णय सुरक्षा व्यवस्था को बहुआयामी बनाने का संकेत देता है। औद्योगिक सुरक्षा और आपदा प्रबंधन को अलग-अलग, लेकिन समन्वित रूप में आगे बढ़ाना आधुनिक शासन व्यवस्था की आवश्यकता है। इससे राज्य की समग्र सुरक्षा संरचना मजबूत होती है।
हालाँकि, केवल बटालियन स्थापित करना ही अंतिम लक्ष्य नहीं है। वास्तविक चुनौती इसके प्रभावी क्रियान्वयन में निहित है। प्रशिक्षण, उपकरण, नेतृत्व और समन्वय, ये चारों तत्व मजबूत न हों तो कोई भी संरचना केवल कागजी उपलब्धि बनकर रह जाती है। इसलिए मेघालय सरकार को अब निरंतर अभ्यास, सिमुलेशन ड्रिल, स्थानीय समुदाय के साथ समन्वय और तकनीकी क्षमता निर्माण पर विशेष ध्यान देना होगा। आपदा प्रबंधन में समुदाय की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि प्रारंभिक प्रतिक्रिया अक्सर स्थानीय स्तर से ही शुरू होती है।
अंततः, मेघालय की यह पहल एक स्पष्ट संदेश देती है- आपदाएँ भले ही अपरिहार्य हों, लेकिन उनकी क्षति को नियंत्रित किया जा सकता है, यदि राज्य तैयार हो। तैयारी का अर्थ केवल उपकरण और जनशक्ति नहीं, बल्कि सोच, योजना और क्रियान्वयन का समन्वित रूप है।
आज, जब जलवायु परिवर्तन आपदाओं की आवृत्ति और तीव्रता दोनों को बढ़ा रहा है, ऐसे समय में मेघालय जैसे छोटे लेकिन संवेदनशील राज्यों द्वारा उठाए गए सक्रिय कदम वास्तव में सराहनीय हैं। यह केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि जीवन बचाने की प्रतिबद्धता है और इसी कारण इसे एक अनुकरणीय उदाहरण के रूप में देखा जाना चाहिए।











