आंदोलनकारी से मुख्यमंत्री बनने तक हिमंत बिस्वा सरमा की कहानी

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हिमंत बिस्वा सरमा ने छात्र जीवन में ही राजनीति में कदम रखा। उनके मित्र राहुल महंता बताते हैं कि सरमा हमेशा स्पष्ट थे कि वे राजनीतिक करियर बनाएंगे।
१९६९ में जोरहाट में जन्मे सरमा का पालन-पोषण गुवाहाटी में हुआ। १९८० के दशक में असम में छात्र आंदोलन के बीच उन्होंने राजनीति में रुचि ली। किशोरावस्था में ही वे पॉलिटिकल साइंस में एमए और १९९५ में कानून की डिग्री प्राप्त कर चुके थे।
१९९६ में कांग्रेस में शामिल हुए और २००१ में मंत्री बने। स्वास्थ्य, शिक्षा और वित्त विभाग संभालते हुए उन्होंने बीजेपी और विपक्ष के आलोचना के बावजूद अपनी स्थिति बनाई।
२०१५ में उन्होंने कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में प्रवेश किया। २०१६ में बीजेपी की जीत के बाद उन्हें कैबिनेट में शामिल किया गया और २०२१ में वे असम के १५वें मुख्यमंत्री बने।
असम की राजनीति में चाय बागान मजदूरों का बड़ा योगदान है। सरमा की सरकार ने कई मजदूरों को उनकी जमीन का मालिकाना हक़ दिया।
सरमा अपनी राजनीति को असमिया पहचान की ‘लड़ाई’ के रूप में देखते हैं। हाल में रहीमा बेगम मामले ने विवाद खड़ा किया, जिसमें एक महिला को “विदेशी” घोषित कर सीमा पार भेज दिया गया। बाद में उन्हें वापस आने की अनुमति मिली।
चुनाव से पहले कांग्रेस ने सरमा की पत्नी रिनिकी भुइयां पर पासपोर्ट और विदेशी कंपनी से जुड़े आरोप लगाए, जिन्हें सरमा ने निराधार बताया।
मुख्यमंत्री सरमा अपनी लोकप्रियता, विकास कार्य, रोज़गार और तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के दम पर चुनाव लड़ रहे हैं। विपक्ष उनका कड़ा विरोध कर रहा है।

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