नन्द किराती देवान
गुवाहाटी: प्रसिद्ध गोर्खा कवि एवं साहित्यकार हरि प्रसाद ‘गोर्खा’ राय की १११वीं जयंती रविवार, १५ मार्च २०२६ को गुवाहाटी में श्रद्धापूर्वक मनाई गई। इस अवसर पर भारतीय गोर्खा परिसंघ (भा गो प) के असम राज्य कार्यालय परिसर में उनकी अर्धकाय प्रतिमा का अनावरण किया गया। इस कार्यक्रम का आयोजन गुवाहाटी की सामाजिक-साहित्यिक संस्था सयपत्री संस्कृतियकला संगम द्वारा किया गया।
मुख्य अतिथि नित्यानन्द उपाध्याय, राष्ट्रीय अध्यक्ष, भारतीय गोर्खा परिसंघ द्वारा प्रतिमा का अनावरण किया गया। समारोह में हरि प्रसाद ‘गोर्खा’ राय की नातिनी एवं प्रतिष्ठित महिला उद्यमी सुमन राय केसी और उनके पति गोपाल केसी, चौतारी सामाजिक समूह के अध्यक्ष सहित साहित्यिक और सामाजिक क्षेत्र की विशिष्ट हस्तियां उपस्थित रहीं।
नित्यानन्द उपाध्याय ने अपने संबोधन में राय की जीवन यात्रा, साहित्यिक योगदान और उनके अमूल्य विरासत पर प्रकाश डाला। उन्होंने देवकोटा नगर मालीगांव, गुवाहाटी में निर्मित दोमंजिला हरि प्रसाद ‘गोर्खा’ राय भवन के लिए प्रायोजन करने वाले गोपाल केसी और सुमन राय केसी का विशेष धन्यवाद किया। भवन में भारतीय गोर्खा परिसंघ असम राज्य समिति और सयपत्री संस्कृतियकला संगम के कार्यालय स्थित हैं।
स्वर्गीय हरि प्रसाद ‘गोर्खा’ राय (१५ मार्च १९१४ – १४ नवंबर २००५) उत्तर-पूर्व भारत के विख्यात गोर्खा भाषाई साहित्यकार एवं साहित्य अकादमी के पूर्व कार्यकारी सदस्य थे। उन्होंने १९३१ में अपनी पहली कविता “ज्योति” पत्रिका में प्रकाशित की और उसके बाद गोर्खा और असमिया साहित्य में निरंतर योगदान दिया। उनके प्रमुख कृतियों में “बाबरी”, “मञ्चरिको बोली” और कथा संग्रह “यहाँ बदनाम हुन्छौ” शामिल हैं।
उनकी कविताएँ “क्याम्प उठ्यो” और “गोर्खाको मोडल” पश्चिम बंगाल और सिक्किम के स्कूल पाठ्यक्रम में सम्मिलित हैं। उन्हें पद्मा ढुंगाना पुरस्कार, जगदम्बी श्री पुरस्कार, परसमणि स्मृति पुरस्कार सहित कई सम्मान प्राप्त हुए।
९५ वर्ष की प्रेरणादायक जीवन यात्रा के बाद, उन्होंने १४ नवंबर २०२५ को कोहिमा में अंतिम सांस ली। आज गोर्खा साहित्य और पहिचान में उनके योगदान को “गोर्खा साहित्य के शिरोमणि” के रूप में याद किया जाता है। गुवाहाटी में उनकी अर्धकाय प्रतिमा उनके अमूल्य योगदान को सम्मान देने का प्रतीक है।








