नई दिल्ली: पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा मोहम्मद आसिफ ने संसद में कहा कि अमेरिका ने इस्लामाबाद के साथ “टॉयलेट पेपर से भी बदतर व्यवहार किया, उसे अपने काम के लिए इस्तेमाल किया और फिर फेंक दिया।” उन्होंने अफगान युद्धों में पाकिस्तान की भूमिका को “एक बड़ी गलती” बताते हुए कहा कि आज देश जिस आतंकवाद का सामना कर रहा है, वह उन्हीं नीतिगत फैसलों का परिणाम है।
पाकिस्तान को लंबे समय से अमेरिका का करीबी सहयोगी माना जाता रहा है। विशेषकर सैन्य नेतृत्व के स्तर पर वाशिंगटन पर निर्भरता की चर्चा होती रही है। हालांकि, विभिन्न पाकिस्तानी नेताओं और विश्लेषकों ने समय-समय पर आरोप लगाया है कि अमेरिका ने पाकिस्तान का उपयोग अपने सामरिक हितों के लिए किया।
संसद में बोलते हुए आसिफ ने कहा कि १९९९ के बाद, खासकर ११ सितंबर २००१ के हमलों के पश्चात अमेरिका के साथ संबंधों को पुनर्जीवित करने की पाकिस्तान ने भारी कीमत चुकाई। उन्होंने पूर्व सैन्य शासकों जनरल जिया-उल-हक और जनरल परवेज मुशर्रफ को विदेशी संघर्षों में देश को झोंकने के लिए जिम्मेदार ठहराया।
‘आतंकवाद तानाशाहों की गलतियों का परिणाम’
रक्षा मंत्री ने इस धारणा को खारिज किया कि अफगान युद्धों में पाकिस्तान की भागीदारी किसी धार्मिक प्रतिबद्धता पर आधारित थी। उन्होंने कहा, “दो पूर्व सैन्य तानाशाह अफगानिस्तान युद्ध में इस्लाम के लिए नहीं, बल्कि एक महाशक्ति को खुश करने के लिए शामिल हुए थे।”
आसिफ ने आगे कहा, “आतंकवाद पूर्व तानाशाहों की गलतियों का नतीजा है।” उनके अनुसार, उन दौर में देश की शिक्षा व्यवस्था को भी युद्ध समर्थन के अनुरूप ढाला गया, जिसके प्रभाव आज भी दिखाई देते हैं।
उल्लेखनीय है कि अफगान युद्धों में भागीदारी के दौरान पाकिस्तान ने हजारों नागरिकों और सुरक्षाकर्मियों को खोया। वर्तमान में भी देश के उत्तरी क्षेत्रों में पाकिस्तान तालिबान की गतिविधियां सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बनी हुई हैं।










