सेमीकंडक्टर से आगे रणनीतिक आत्मनिर्भरता का विस्तार
कोलकाता: भारत की अगली बड़ी औद्योगिक कहानी सेमीकंडक्टर की स्वच्छ प्रयोगशाला के भीतर नहीं मिल सकती। यह एक बहुत छोटी चीज़ के भीतर छिपी हो सकती है: स्थायी चुंबक।
ये कॉम्पैक्ट घटक विद्युत वाहनों, पवन टर्बाइनों, उन्नत इलेक्ट्रॉनिक्स, एयरोस्पेस प्लेटफॉर्म और रक्षा प्रणालियों की मोटरों के लिए आवश्यक हैं। विद्युतीकरण, स्वचालन और उच्च-प्रौद्योगिकी विनिर्माण की ओर वैश्विक बदलाव के साथ इनका महत्व बढ़ा है।
भारत अब इनके इर्द-गिर्द घरेलू पारिस्थितिकी तंत्र बनाने की दिशा में निर्णायक रूप से आगे बढ़ रहा है। इसका नवीनतम संकेत अगस्त में मिला, जब उद्योग मंत्रालय को भारत में एकीकृत दुर्लभ-पृथ्वी स्थायी चुंबक निर्माण सुविधाएँ स्थापित करने की इच्छुक कंपनियों से २० निविदाएँ प्राप्त हुईं।
निविदादाताओं में लार्सन एंड टुब्रो, कोल इंडिया, रीन्यू, एटेरो रिसाइक्लिंग, ट्वेंटी माइक्रॉन्स, लोहम मैग्नेट्स एंड एनर्जी सॉल्यूशंस, सिंगापुर की एनईओ परफॉर्मेंस मैटेरियल्स और प्रोटेरियल इंडिया सहित अन्य कंपनियाँ शामिल हैं। १२ अगस्त की अंतिम तिथि के बाद तकनीकी निविदाएँ १३ अगस्त को खोली गईं।
यह प्रतिक्रिया कच्चे माल को सुरक्षित करने से आगे बढ़ने वाले नीतिगत प्रयास को नई गति देती है। यह भारत के दुर्लभ-पृथ्वी संसाधनों को देश के कुछ सबसे तेज़ी से बढ़ रहे क्षेत्रों के लिए आवश्यक उच्च-मूल्य वाले उत्पादों में बदलने की औद्योगिक क्षमता विकसित करने के बारे में है।
चुंबक रणनीतिक संपत्ति बनते हैं
दुर्लभ-पृथ्वी स्थायी चुंबक उपलब्ध सबसे शक्तिशाली चुंबकों में शामिल हैं और वहाँ उपयोग किए जाते हैं जहाँ उच्च शक्ति, कॉम्पैक्ट आकार और दक्षता की आवश्यकता होती है। विद्युत मोटर, पवन टर्बाइन, उन्नत इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, एयरोस्पेस प्लेटफॉर्म और रक्षा प्रणालियाँ सभी इन सामग्रियों पर निर्भर करती हैं।
भारत की औद्योगिक महत्वाकांक्षाओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण श्रेणी सिंटर्ड नियोडिमियम-आयरन-बोरोन, या एनडीएफईबी, चुंबकों की है। नियोडिमियम और प्रसीओडिमियम, जिन्हें सामान्यतः एनडीपीआर कहा जाता है, उत्पादन शृंखला का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
सरकार का उद्देश्य केवल दुर्लभ-पृथ्वी खनिजों का उत्खनन बढ़ाना नहीं है। लक्ष्य एनडीपीआर ऑक्साइड से लेकर तैयार चुंबकों तक एकीकृत मूल्य शृंखला तैयार करना है।
यह अंतर महत्वपूर्ण है। भारत की व्यापक महत्वपूर्ण-खनिज रणनीति केवल उत्खनन चरण पर रुकने के बजाय मूल्यवर्धन, प्रसंस्करण और विनिर्माण पर केंद्रित है। उद्योग मंत्रालय की नवीनतम पहल इस दृष्टिकोण का स्पष्ट उदाहरण है।
७.७४ अरब डॉलर की औद्योगिक शर्त
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने नवंबर २०२५ में सिंटर्ड दुर्लभ-पृथ्वी स्थायी चुंबकों के निर्माण को बढ़ावा देने वाली योजना को मंजूरी दी, जिसका वित्तीय परिव्यय ७,२८० करोड़ रुपये था। इस योजना का लक्ष्य भारत में प्रतिवर्ष ६,००० मीट्रिक टन एकीकृत दुर्लभ-पृथ्वी स्थायी चुंबक उत्पादन क्षमता स्थापित करना है।
वैश्विक प्रतिस्पर्धी बोली के माध्यम से चुने गए पाँच लाभार्थियों के बीच क्षमता का वितरण किया जाएगा। प्रत्येक लाभार्थी अधिकतम १,२०० मीट्रिक टन प्रति वर्ष क्षमता के लिए पात्र होगा।
योजना की अवधि पुरस्कार की तारीख से सात वर्ष है। इसमें उत्पादन सुविधाएँ स्थापित करने के लिए दो वर्ष और उसके बाद दुर्लभ-पृथ्वी स्थायी चुंबकों की बिक्री से जुड़ी प्रोत्साहन राशि के वितरण के लिए पाँच वर्ष निर्धारित हैं।
सरकार की योजना के अनुसार, वित्तीय संरचना में बिक्री से जुड़े प्रोत्साहनों के लिए ६,४५० करोड़ रुपये और ७३० करोड़ रुपये का पूंजीगत अनुदान शामिल है।
इस योजना में उत्पादन को केंद्र में रखा गया है। केवल सुविधाएँ स्थापित करने पर ध्यान देने के बजाय सरकारी सहायता को चुंबकों के वास्तविक उत्पादन और बिक्री से जोड़ा गया है।
बीस निविदाएँ गति का संकेत देती हैं
वैश्विक निविदा प्रक्रिया की प्रतिक्रिया कार्यक्रम के औद्योगिक आयाम को मजबूत करती है। २० कंपनियों और कंसोर्टियमों ने निविदाएँ जमा कीं। इनमें स्थापित इंजीनियरिंग कंपनियाँ, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम, रिसाइक्लिंग विशेषज्ञ, ऊर्जा कंपनियाँ, चुंबक निर्माता और अंतरराष्ट्रीय प्रतिभागी शामिल हैं।
सूची में लार्सन एंड टुब्रो, कोल इंडिया, रीन्यू, एटेरो रिसाइक्लिंग, ट्वेंटी माइक्रॉन्स, लोहम मैग्नेट्स एंड एनर्जी सॉल्यूशंस, सिंगापुर की एनईओ परफॉर्मेंस मैटेरियल्स, प्रोटेरियल इंडिया और प्रोजिल ग्रीन एनर्जी शामिल हैं।
निविदा प्रक्रिया प्रतिस्पर्धी चयन के माध्यम से क्षमता विकसित करने के सरकार के प्रयास को दर्शाती है। उद्योग मंत्रालय ने २० मार्च २०२६ को प्रस्ताव के लिए अनुरोध जारी किया और व्यापक भागीदारी को सुगम बनाने के लिए बाद में जमा करने की अंतिम तिथि १२ अगस्त तक बढ़ा दी।
२० निविदाएँ अब लक्षित ६,००० मीट्रिक टन प्रति वर्ष घरेलू क्षमता में योगदान देने वाले निर्माताओं के चयन का आधार प्रदान करती हैं। भारत के लिए इसका महत्व अंततः चुने जाने वाले संयंत्रों की संख्या से कहीं आगे जाता है। विभिन्न औद्योगिक पृष्ठभूमि वाली कंपनियों की भागीदारी इस बात का संकेत देती है कि दुर्लभ-पृथ्वी प्रसंस्करण और चुंबक निर्माण को व्यापक औद्योगिक अवसर के हिस्से के रूप में देखा जा रहा है।
संसाधन उत्पादन से मेल खाते हैं
भारत के पास पहले से ही पर्याप्त दुर्लभ-पृथ्वी संसाधन हैं। अन्वेषण और अनुसंधान के लिए परमाणु खनिज निदेशालय के अनुसार, देश में लगभग ७.२३ मिलियन टन दुर्लभ-पृथ्वी ऑक्साइड समतुल्य, जो १३.१५ मिलियन टन मोनाजाइट संसाधनों में मौजूद हैं, उपलब्ध हैं।
गुजरात और राजस्थान के कठोर चट्टानी क्षेत्रों में १२.९ लाख टन ‘इन-सिटू’ यानी प्राकृतिक अवस्था में मौजूद दुर्लभ-खनिज संसाधनों की पहचान की गई है। ये संसाधन ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, केरल, महाराष्ट्र, गुजरात, झारखंड और पश्चिम बंगाल सहित विभिन्न राज्यों में पाए जाते हैं।
भारत की नीतिगत प्राथमिकता अब इन संसाधनों को औद्योगिक मूल्य शृंखला से जोड़ने पर केंद्रित हो रही है। सरकारी आकलनों में ‘अपस्ट्रीम’ यानी उत्खनन और प्रारंभिक चरण की क्षमता तथा औद्योगिक स्तर की ‘मिडस्ट्रीम’ और ‘डाउनस्ट्रीम’ यानी प्रसंस्करण और विनिर्माण चरणों के बीच बड़े अंतर की ओर संकेत किया गया है।
भारत के पास दुर्लभ-खनिज अयस्कों के उत्खनन, पृथक्करण और प्रसंस्करण की क्षमता है, जबकि नई दुर्लभ-पृथ्वी स्थायी चुंबक योजना का उद्देश्य इन सामग्रियों को तैयार चुंबकों में बदलने के लिए आवश्यक औद्योगिक चरण स्थापित करना है।
इससे एक अधिक पूर्ण घरेलू शृंखला विकसित हो सकती है, जिसमें मूल्य केवल कच्चे माल तक सीमित न रहकर विभिन्न चरणों में सृजित होगा।
महत्वपूर्ण खनिजों को अतिरिक्त प्रोत्साहन
यह दुर्लभ-खनिज पहल एक व्यापक राष्ट्रीय रणनीति का हिस्सा है। जनवरी २०२५ में स्वीकृत राष्ट्रीय महत्वपूर्ण खनिज मिशन की शुरुआत महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति सुरक्षा सुनिश्चित करने तथा अन्वेषण और उत्खनन से लेकर परिष्करण, प्रसंस्करण और उपयोग की अवधि पूरी कर चुके उत्पादों से पुनर्प्राप्ति तक की मूल्य शृंखला को मजबूत करने के लिए की गई थी।
इस मिशन का कुल व्यय १६,३०० करोड़ रुपये है, जबकि सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों और अन्य हितधारकों से अतिरिक्त १८,००० करोड़ रुपये के निवेश की अपेक्षा है। भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण को २०२४-२५ से २०३०-३१ की अवधि के दौरान १,२०० अन्वेषण परियोजनाएँ संचालित करने की जिम्मेदारी दी गई है।
यह कार्यक्रम भारत में खनिज अन्वेषण का दायरा बढ़ा रहा है। खनन मंत्रालय के अनुसार, जून २०२६ तक ५६ महत्वपूर्ण और रणनीतिक खनिज ब्लॉकों की सफलतापूर्वक नीलामी की जा चुकी थी। अलग-अलग अन्वेषण कार्यक्रमों के माध्यम से तटीय रेत, आंतरिक भू-भाग के ‘प्लेसर’ निक्षेपों और कठोर चट्टानी संरचनाओं में भी दुर्लभ-खनिज संसाधनों का अध्ययन किया जा रहा है।
प्रौद्योगिकी के साथ दुर्लभ खनिजों का संयोजन
दुर्लभ-खनिज संबंधी यह पहल भारत की व्यापक प्रौद्योगिकी और विनिर्माण महत्वाकांक्षाओं से निकटता से जुड़ी है। देश ने पिछले एक दशक में मोबाइल फोन और इलेक्ट्रॉनिक्स के क्षेत्र में क्षमता विकसित करने पर खर्च किया है और अब सेमीकंडक्टर, विद्युत वाहन, नवीकरणीय ऊर्जा उपकरण तथा उन्नत विनिर्माण के क्षेत्रों में विस्तार कर रहा है।
इनमें से कई क्षेत्रों के केंद्र में स्थायी चुंबक हैं। विद्युत वाहनों के लिए कुशल मोटरों की आवश्यकता होती है, जबकि पवन टर्बाइन शक्तिशाली जनरेटरों पर निर्भर करते हैं। उन्नत इलेक्ट्रॉनिक्स को कॉम्पैक्ट और उच्च-प्रदर्शन वाले घटकों की आवश्यकता होती है। एयरोस्पेस और रक्षा प्लेटफॉर्म विशेष प्रणालियों का उपयोग करते हैं, जिनमें आकार, वजन और दक्षता महत्वपूर्ण होते हैं।
घरेलू चुंबक उद्योग एक साथ कई रणनीतिक उत्पादन प्राथमिकताओं को जोड़ सकता है। यही कारण है कि दुर्लभ-पृथ्वी कार्यक्रम भारत की सेमीकंडक्टर रणनीति का प्रतिस्पर्धी होने के बजाय उसका पूरक बन सकता है। सेमीकंडक्टर आधुनिक प्रणालियों के पीछे इलेक्ट्रॉनिक बुद्धिमत्ता प्रदान करते हैं, जबकि स्थायी चुंबक मोटरों, जनरेटरों और अन्य उन्नत उपकरणों के लिए आवश्यक भौतिक घटक प्रदान करते हैं। साथ मिलकर, वे प्रौद्योगिकी-आधारित औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र के अलग-अलग स्तरों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
कॉरिडोर औद्योगिक पैमाने को बढ़ाते हैं
नीतिगत प्रयास को भौगोलिक आयाम भी मिल रहा है। २०२६-२७ के केंद्रीय बजट में दुर्लभ-पृथ्वी स्थायी चुंबकों के खनन, प्रसंस्करण, अनुसंधान और विनिर्माण के लिए ओडिशा, केरल, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में समर्पित दुर्लभ-पृथ्वी कॉरिडोर घोषित किए गए हैं।
इन कॉरिडोरों का उद्देश्य मूल्य शृंखला के विभिन्न चरणों को एक-दूसरे के करीब लाना है, ताकि संसाधनों की उपलब्धता को प्रसंस्करण, अनुसंधान और विनिर्माण क्षमताओं से जोड़ा जा सके।
ऐसा दृष्टिकोण दुर्लभ-पृथ्वी उत्पादन को अधिक व्यवस्थित औद्योगिक संरचना प्रदान कर सकता है और उद्योगों, प्रौद्योगिकी विकास तथा विशेषीकृत विनिर्माण को समर्थन देने के अवसर पैदा कर सकता है।
सरकार की रणनीति परिणामस्वरूप अलग-अलग परियोजनाओं से आगे बढ़कर पारिस्थितिकी तंत्र मॉडल की ओर बढ़ रही है।
गहरे पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण
भारतीय दुर्लभ-पृथ्वी लिमिटेड की ओर से एक और महत्वपूर्ण विकास हुआ है। कंपनी ने दुर्लभ-पृथ्वी और टाइटेनियम अनुप्रयोगों से संबंधित प्रौद्योगिकियों को व्यावसायीकरण के लिए उपलब्ध कराया है।
प्रौद्योगिकी हस्तांतरण पैकेज में प्रक्रिया संबंधी ज्ञान, इंजीनियरिंग जानकारी, उपकरण विनिर्देश, गुणवत्ता-आश्वासन प्रोटोकॉल और तकनीकी कर्मचारियों के लिए प्रशिक्षण शामिल हैं। इससे सरकारी स्वामित्व वाली तकनीकी क्षमताओं और व्यावसायिक उत्पादन के बीच एक और कड़ी बनती है।
व्यापक नीति ढाँचे में अब अन्वेषण, उत्खनन, पृथक्करण, परिष्करण, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, चुंबक निर्माण, पुनर्चक्रण और अंतिम-उपयोग वाले उद्योगों को शामिल किया जाने लगा है। यही व्यापकता भारत की दुर्लभ-पृथ्वी रणनीति को महत्वपूर्ण बनाती है।
संसाधनों से औद्योगिक शक्ति तक
भारत का दुर्लभ-पृथ्वी अभियान उसके विनिर्माण क्षेत्र की कहानी में एक नया अध्याय प्रस्तुत करता है। सेमीकंडक्टर अभियान चिप्स और उन्नत इलेक्ट्रॉनिक्स के आसपास क्षमताएँ विकसित कर रहा है। दुर्लभ-पृथ्वी कार्यक्रम एक अन्य आवश्यक स्तर को संबोधित करता है: वे विशेष सामग्रियाँ और घटक जो आधुनिक मशीनों, वाहनों, जनरेटरों और रक्षा प्रणालियों को काम करने में सक्षम बनाते हैं।
तत्काल मील का पत्थर ७,२८० करोड़ रुपये की योजना के तहत प्राप्त २० निविदाओं में से निर्माताओं का चयन होगा। दीर्घकालिक उद्देश्य ६,००० मीट्रिक टन प्रति वर्ष की एकीकृत स्थायी-चुंबक क्षमता स्थापित करना और इसे भारत के उभरते महत्वपूर्ण-खनिज, स्वच्छ-ऊर्जा, इलेक्ट्रॉनिक्स तथा उन्नत-विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र से जोड़ना है।
भारत की दुर्लभ-पृथ्वी रणनीति तेजी से भूगर्भीय संसाधनों को औद्योगिक क्षमता में बदलने के बारे में होती जा रही है। खनिज निक्षेपों से प्रसंस्कृत ऑक्साइड, ऑक्साइड से मिश्रधातु और मिश्रधातु से तैयार चुंबकों तक की यात्रा उस प्रकार के मूल्यवर्धन का प्रतिनिधित्व करती है, जो घरेलू विनिर्माण को गहरा कर सकती है।
सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स और विद्युत गतिशीलता की कहानियों से आगे अब एक और रणनीतिक औद्योगिक शृंखला आकार ले रही है—ऐसी शृंखला जो भौतिक आकार में छोटी, लेकिन वैश्विक अर्थव्यवस्था को परिभाषित करने वाली प्रौद्योगिकियों के लिए लगातार अधिक महत्वपूर्ण होती जा रही सामग्रियों के इर्द-गिर्द निर्मित है।





