वाशिंगटन: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन द्वारा सऊदी अरब के साथ नागरिक परमाणु ऊर्जा समझौता कांग्रेस में पेश किए जाने के बाद पश्चिम एशिया के ऊर्जा बाजार में अमेरिका, चीन और रूस के बीच प्रतिस्पर्धा और तेज होने के संकेत मिले हैं।
३० वर्षों के लिए प्रस्तावित ‘१२३ समझौता’ लागू होने पर अमेरिकी कंपनियों को सऊदी अरब में एपी–१००० तकनीक पर आधारित परमाणु रिएक्टरों के निर्माण और परमाणु बुनियादी ढांचे के विकास में सीधे भागीदारी का अवसर मिलेगा। इसे अमेरिकी परमाणु उद्योग के लिए बड़े व्यावसायिक अवसर के रूप में देखा जा रहा है।
सऊदी अरब तेल पर निर्भर अपनी अर्थव्यवस्था में विविधता लाने की ‘विजन २०३०’ रणनीति के तहत वैकल्पिक ऊर्जा के विस्तार में जुटा है। इसी योजना के तहत वह बड़े पैमाने पर नागरिक परमाणु ऊर्जा विकसित करना चाहता है। इस क्षेत्र में चीन और रूस पहले से ही सक्रिय हैं।
रूस की रोसाटॉम और चीन की सरकारी ऊर्जा कंपनियां विभिन्न देशों में परमाणु परियोजनाओं को आगे बढ़ा रही हैं। ऐसे में अमेरिका भी सऊदी अरब के बाजार में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है। विश्लेषकों का मानना है कि इससे तीनों शक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा और तीव्र हो सकती है।
हालांकि, यह समझौता तुरंत लागू नहीं होगा। अमेरिकी कांग्रेस ९० दिनों तक इसकी समीक्षा करेगी। इस अवधि के दौरान यदि सांसदों की ओर से कोई बाधा नहीं डाली जाती है तो समझौता स्वतः लागू हो जाएगा।
लेकिन समझौते का राजनीतिक पक्ष अभी भी जटिल है। ट्रंप प्रशासन ने इसे सऊदी अरब द्वारा इजरायल के साथ संबंध सामान्य करने की शर्त से जोड़ा है। वहीं, सऊदी अरब का कहना है कि जब तक स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना की दिशा में विश्वसनीय प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ती, तब तक वह इजरायल को औपचारिक मान्यता नहीं देगा।









