नई दिल्ली: भारत और रूस के संयुक्त उपक्रम (जॉइंट वेंचर) द्वारा निर्मित शक्तिशाली ‘ब्रह्मोस’ सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल का उत्पादन २० फीसदी तक बढ़ गया है। उत्तर प्रदेश के लखनऊ में स्थापित नए अत्याधुनिक उत्पादन केंद्र (प्लांट) के चालू होने से मिसाइल उत्पादन में यह बड़ी सफलता मिली है।
ब्रह्मोस एयरोस्पेस के सह-निदेशक अलेक्जेंडर मक्सिचेव के अनुसार, लखनऊ प्लांट ने मिसाइलों का पहला बैच सफलतापूर्वक तैयार कर लिया है। इस नई सुविधा के शुरू होने से भारत में ब्रह्मोस के निर्माण की गति और क्षमता दोनों में भारी वृद्धि हुई है। वर्तमान में भारत में लखनऊ सहित हैदराबाद, तिरुवनंतपुरम और पिलानी में कुल चार मैन्युफैक्चरिंग यूनिट काम कर रही हैं, जिनमें से लखनऊ अब सबसे बड़ा केंद्र बन गया है।
फरवरी १९९८ में भारत के रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) और रूस के एनपीओ मशीनोस्ट्रोयेनिया के बीच साझेदारी से ब्रह्मोस एयरोस्पेस की स्थापना हुई थी। भारत की ब्रह्मपुत्र नदी और रूस की मोस्कवा नदी के नाम को मिलाकर इसका नाम ‘ब्रह्मोस’ रखा गया है। मैक २.८ की रफ्तार (ध्वनि की गति से लगभग तीन गुना तेज) से चलने वाली इस मिसाइल को पनडुब्बी, युद्धपोत, लड़ाकू विमान और जमीन, चारों प्लेटफॉर्म से लॉन्च किया जा सकता है।
उत्पादन क्षमता में हुई इस वृद्धि से भारत को अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निर्यात के बड़े ऑर्डर मिलने की संभावना मजबूत हो गई है। हाल ही में फिलीपींस तटीय एंटी-शिप ब्रह्मोस मिसाइल प्रणाली खरीदने वाला पहला विदेशी देश बना है, जबकि इंडोनेशिया और वियतनाम जैसे दक्षिण-पूर्वी एशियाई देश भी इस तकनीक को हासिल करने में गहरी रुचि दिखा रहे हैं। इसके साथ ही, भारत और रूस अब ८०० किलोमीटर तक मार करने वाले अपग्रेडेड वर्जन और अगली पीढ़ी की ‘ब्रह्मोस-II’ हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल के विकास पर भी तेजी से काम कर रहे हैं।










