नई दिल्ली: दुनियाभर में ५जी के बाद अब ६जी नेटवर्क को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं, लेकिन इसे लॉन्च करने से पहले ही टेलीकॉम कंपनियों की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं। शुरुआत में यह माना जा रहा था कि ५जी से ६जी पर जाना महज एक सॉफ्टवेयर अपग्रेड की तरह होगा और कंपनियों को नया खर्च नहीं करना पड़ेगा। हालांकि, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और स्मार्ट ग्लासेस जैसी तकनीकों के तेजी से बढ़ते चलन ने पूरी बाजी पलट दी है। एरिक्सन और नोकिया जैसी दिग्गज कंपनियों का कहना है कि अब कंपनियों को ६जी के लिए महंगे हार्डवेयर में भारी निवेश करना होगा।
हाई फ्रिक्वेन्सी बैंड और सिग्नल की समस्या
६जी नेटवर्क को सुचारू रूप से चलाने के लिए ६जी हर्ट्ज और ७जी हर्ट्ज जैसे ऊंचे फ्रीक्वेंसी बैंड्स की जरूरत पड़ेगी, क्योंकि मौजूदा ४जी और ५जी बैंड्स पहले से ही पूरी तरह फुल हैं। इन नए सिग्नल्स के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि ये ज्यादा दूर तक नहीं जा पाते और दीवारों को भी पार नहीं कर पाते हैं। इस तकनीकी रुकावट को दूर करने के लिए कंपनियों को महंगे एंटीना और बीमफॉर्मिंग रेडियो लगाने होंगे, ताकि सिग्नल को सीधे यूजर के डिवाइस तक सटीक रूप से पहुंचाया जा सके। साथ ही, डेटा अपलोड करने की बढ़ती मांग के लिए भी बिल्कुल नए सिस्टम की आवश्यकता होगी।
५जी स्टैंडअलोन कोर की अनिवार्य शर्त
६जी का पूरा फायदा उठाने के लिए नेटवर्क का सॉफ्टवेयर ब्रेन यानी ‘५जी स्टैंडअलोन कोर’ होना बेहद जरूरी है। भारत जैसे देशों में यह धीरे-धीरे रोल-आउट हो रहा है, लेकिन यूरोप के कई देशों में कंपनियां अभी भी ४जी नेटवर्क के बुनियादी ढांचे पर ही ५जी चला रही हैं। जो कंपनियां अपने सिस्टम को ५जी स्टैंडअलोन कोर पर अपग्रेड नहीं कर पाएंगी, उनके लिए ६जी पर शिफ्ट होना नामुमकिन होगा। ऐसे में सिर्फ सॉफ्टवेयर अपग्रेड के भरोसे ६जी लाने का सपना टूटता दिख रहा है।
बजट और भारी निवेश का संकट
जब ५जी लॉन्च हुआ था, तब ऑटोमैटिक कारों और रोबोटिक सर्जरी जैसे बड़े-बड़े वादे किए गए थे, लेकिन असल में यह सिर्फ बेहतर स्पीड वाला इंटरनेट ही साबित हुआ। इसी वजह से कंपनियां अब ६जी को लेकर फूंक-फूंक कर कदम रख रही हैं। महंगे हार्डवेयर की मजबूरी के कारण ऑपरेटर्स को ना चाहते हुए भी भारी बजट खर्च करना पड़ेगा, जिससे टेलीकॉम कंपनियों का वित्तीय संतुलन पूरी तरह बिगड़ सकता है।










