दक्षिण से उत्तर की ओर: चीन यात्रा, विश्वास की कूटनीति और नई राजनीतिक शक्ति की परीक्षा

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देवेन्द्र किशोर ढुंगाना

नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल की चीन यात्रा केवल एक नियमित कूटनीतिक कार्यक्रम नहीं है, बल्कि इसे वर्तमान सरकार की विदेश नीति, पड़ोसी देशों के साथ संबंधों तथा राष्ट्रीय हितों के प्रति उसके दृष्टिकोण की एक महत्वपूर्ण परीक्षा के रूप में देखा जा रहा है। विशेष रूप से, जेन जी आंदोलन की पृष्ठभूमि से उभरी नई राजनीतिक धारा, उससे गठित सरकार तथा उसके द्वारा स्थापित की जाने वाली नई राजनीतिक संस्कृति को लेकर भारत और चीन दोनों ही पड़ोसी देश निकटता से निगरानी कर रहे हैं।

यद्यपि अब तक सरकार की प्राथमिकताएँ सुशासन, आर्थिक पुनरुत्थान और प्रशासनिक सुधार पर केंद्रित दिखाई देती हैं, विदेश नीति के क्षेत्र में वह अभी अपनी स्पष्ट पहचान स्थापित नहीं कर सकी है। यही कारण है कि चीन में दिखाई देने वाली जिज्ञासा और आशंकाएँ केवल इस यात्रा तक सीमित नहीं हैं; वे इस प्रश्न से भी जुड़ी हुई हैं कि नई राजनीतिक शक्ति नेपाल की पारंपरिक कूटनीतिक संतुलन नीति को किस प्रकार आगे बढ़ाती है।

नेपाल की राष्ट्रीयता की पहली परीक्षा: सीमा विवाद में सरकार की भूमिका:

नेपाल के आधुनिक राजनीतिक इतिहास में राष्ट्रीय स्वाभिमान से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा विषय भारत के साथ सीमा विवाद रहा है। विशेष रूप से कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा क्षेत्रों को लेकर विवाद ने लंबे समय से नेपाल की राष्ट्रीय चेतना और राजनीतिक विमर्श को प्रभावित किया है।

वर्तमान सरकार के उदय से पहले हुए आंदोलनों में स्थापित राजनीतिक दलों की आलोचना करते हुए नई पीढ़ी ने राष्ट्रीय हितों के प्रश्नों पर स्पष्ट और दृढ़ रुख की मांग की थी। इसी कारण वर्तमान नेतृत्व से जनता की अपेक्षाएँ केवल सुशासन तक सीमित नहीं हैं; राष्ट्रीय संप्रभुता और भू-भाग से संबंधित मुद्दों पर भी सशक्त नेतृत्व की अपेक्षा की जा रही है।

भारत यात्रा के दौरान विदेश मंत्री द्वारा सीमा समस्या के समाधान हेतु संवाद और संस्थागत तंत्र की आवश्यकता पर बल देना एक सकारात्मक कदम है। किंतु नेपाल के भीतर जनमत केवल संवाद ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हितों के स्पष्ट और साहसिक प्रतिनिधित्व की भी अपेक्षा करता है। यदि नई राजनीतिक धारा सीमा विवाद के विषय में राष्ट्रीय सहमति के आधार पर दृढ़ रुख प्रस्तुत करने में सफल होती है, तो इससे उसकी राजनीतिक वैधता और अधिक मजबूत हो सकती है।
किन्तु यहीं से एक नई कूटनीतिक चुनौती भी आरंभ होती है।

चीन अभी पूरी तरह आश्वस्त क्यों नहीं है?

नेपाल और चीन के संबंध परंपरागत रूप से विवादरहित और मैत्रीपूर्ण माने जाते हैं। हिमालय के पार स्थित पड़ोसी देशों के रूप में दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक, धार्मिक, व्यापारिक और राजनीतिक संबंधों का लंबा इतिहास रहा है।

अरनिको के योगदान से लेकर आधुनिक काल तक नेपाल–चीन संबंध पारस्परिक सम्मान, संप्रभुता की स्वीकृति तथा एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने के सिद्धांत पर आधारित रहे हैं। चीन ने नेपाल के राजनीतिक परिवर्तन के विभिन्न चरणों में स्थिरता और विकास को प्राथमिकता दी है, जबकि नेपाल ने भी “एक चीन नीति” के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को निरंतर दोहराया है।

फिर भी वर्तमान राजनीतिक परिवर्तन के बाद चीन की ओर से कुछ सतर्कता दिखाई देना अस्वाभाविक नहीं है।

जेन जी आंदोलन के दौरान दिखाई गई कुछ गतिविधियाँ, पश्चिमी देशों की सक्रियता, सामाजिक मीडिया पर चीन-विरोधी मानी जाने वाली अभिव्यक्तियाँ तथा तिब्बत से जुड़े संवेदनशील मुद्दों को चीन गंभीरता से देखता है। चीन के लिए तिब्बत केवल एक क्षेत्रीय प्रश्न नहीं, बल्कि उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा और भौगोलिक अखंडता से जुड़ा अत्यंत संवेदनशील विषय है।

इसी कारण नेपाल में तिब्बती समुदाय की गतिविधियों और उनके प्रति राज्य के व्यवहार को बीजिंग लगातार ध्यानपूर्वक देखता रहता है।

नेपाल सरकार बार-बार यह नीति दोहराती रही है कि उसकी भूमि किसी भी पड़ोसी देश के विरुद्ध उपयोग नहीं होने दी जाएगी, फिर भी व्यावहारिक स्तर पर चीन अभी पूरी तरह आश्वस्त नहीं दिखाई देता। विश्लेषकों का मानना है कि वर्तमान सरकार भारत के साथ सीमा विवाद के प्रश्न पर अपेक्षाकृत स्पष्ट दिखाई देती है, लेकिन तिब्बती गतिविधियों के प्रति कुछ नरम रुख रखने की धारणा चीन में बनी हुई है।

इसी संदर्भ में विदेश मंत्री की चीन यात्रा को केवल एक औपचारिक कूटनीतिक कार्यक्रम से कहीं अधिक महत्व दिया जा रहा है।

विश्वास की नींव पर ही संभव है विकास साझेदारी:

नेपाल और चीन के संबंध केवल राजनीतिक नहीं हैं; वे आर्थिक और अवसंरचनात्मक विकास से भी गहराई से जुड़े हुए हैं।

काठमांडू–केरुङ रेलमार्ग की संभाव्यता अध्ययन, हिमालयी सीमा नाकों का उन्नयन, ऊर्जा सहयोग, पर्यटन विस्तार, कृषि आधुनिकीकरण तथा सीमा-पार व्यापार विस्तार जैसे विषय लंबे समय से चर्चा में हैं।

चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) के अंतर्गत नेपाल में अवसंरचना विकास की अनेक संभावनाएँ दिखाई देती हैं। हालांकि वित्तीय मॉडल, ऋण और अनुदान की प्रकृति तथा परियोजनाओं की प्राथमिकताओं के संबंध में अभी भी स्पष्ट सहमति बनना शेष है।

राजनीतिक स्थिरता प्राप्त होने की वर्तमान परिस्थिति में इन परियोजनाओं को आगे बढ़ाने का अवसर मौजूद है। लेकिन किसी भी आर्थिक साझेदारी की आधारशिला राजनीतिक विश्वास ही होता है।

यदि चीन नेपाल को अपनी सुरक्षा चिंताओं के प्रति संवेदनशील और विश्वसनीय साझेदार के रूप में अनुभव नहीं कर पाता, तो बड़ी परियोजनाओं के कार्यान्वयन में अपेक्षित गति प्राप्त करना कठिन हो सकता है।

इसलिए मंत्री शिशिर खनाल की यात्रा में रेल, सड़क या निवेश से भी अधिक महत्वपूर्ण विषय आपसी विश्वास का पुनर्निर्माण प्रतीत होता है।

असंलग्नता और संतुलन का नेपाली मार्ग:

नेपाल की विदेश नीति का मूल आधार असंलग्नता, संप्रभु समानता और पड़ोसी देशों के साथ संतुलित संबंध रहा है। भूगोल ने नेपाल को भारत और चीन के बीच एक संवेदनशील रणनीतिक क्षेत्र में स्थापित किया है। इसलिए किसी एक शक्ति केंद्र की ओर अत्यधिक झुकाव नेपाल के दीर्घकालिक हित में नहीं हो सकता।

वर्तमान सरकार पर कभी पश्चिम की ओर झुकाव का आरोप लगाया जाता है, तो कभी भारत के साथ संबंध सुधार को प्राथमिकता देने का। ऐसे आरोपों का वास्तविक उत्तर भाषणों और प्रेस विज्ञप्तियों से नहीं, बल्कि व्यवहार से दिया जाना चाहिए।

नेपाल को भारत के साथ अपने ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आर्थिक संबंधों का सम्मान करते हुए चीन के साथ विकास साझेदारी को भी मजबूत बनाना होगा। यही संतुलन उसकी सफल विदेश नीति का आधार बन सकता है।

एक पड़ोसी को आश्वस्त करने के लिए दूसरे का विरोध करना नेपाल के हित में नहीं है। बल्कि दोनों देशों के साथ विश्वास और सहयोग बनाए रखते हुए राष्ट्रीय हित को केंद्र में रखना ही नेपाली कूटनीतिक परंपरा का सार है।

नई राजनीतिक शक्ति की सबसे बड़ी परीक्षा:

जेन जी आंदोलन से उत्पन्न नई राजनीतिक शक्ति ने पारंपरिक राजनीति को चुनौती देकर जनता का विश्वास अर्जित किया है। किंतु आंदोलन और शासन के बीच बड़ा अंतर होता है। शासन में आने के बाद राष्ट्रीय सुरक्षा, पड़ोसी देशों के साथ संबंध, अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और आर्थिक साझेदारी जैसी जटिल वास्तविकताओं का सामना करना पड़ता है।

इसी कारण वर्तमान सरकार की वास्तविक परीक्षा विदेश नीति के क्षेत्र में होगी।

कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा के प्रश्न पर राष्ट्रीय रुख बनाए रखना, तिब्बत संबंधी संवेदनशीलता के विषय में चीन को आश्वस्त करना, विकास साझेदारी को गति देना तथा असंलग्न विदेश नीति की निरंतरता सुनिश्चित करना—ये सभी चुनौतियाँ एक साथ उपस्थित हैं।

विदेश मंत्री शिशिर खनाल की चीन यात्रा इसी व्यापक संदर्भ का एक प्रारंभिक अध्याय है। यात्रा के दौरान व्यक्त की गई प्रतिबद्धताओं से अधिक, उसके बाद सरकार द्वारा किए जाने वाले कार्य इसकी सफलता निर्धारित करेंगे।

अंततः चीन को आश्वस्त करने या भारत के साथ विश्वास बढ़ाने का कार्य शब्दों से नहीं, बल्कि व्यवहार से होता है। नई सरकार की कूटनीतिक विश्वसनीयता भी उसके आगामी व्यवहार, नीतियों और निर्णयों के आधार पर ही आंकी जाएगी।

नेपाल के लिए वर्तमान आवश्यकता केवल विकास के अवसर तलाशना नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय हित को केंद्र में रखते हुए दोनों पड़ोसी देशों के साथ विश्वास का एक स्थायी सेतु निर्मित करना है। यही सेतु मजबूत होने पर ही राजनीतिक स्थिरता को आर्थिक समृद्धि में परिवर्तित किया जा सकेगा।

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