— देवेन्द्र किशोर ढुंगाना
नेपाल ने पिछले सात दशकों में राजनीतिक परिवर्तन के अनेक चरणों को पार किया है। राणा शासन के अंत से लेकर लोकतांत्रिक आंदोलन, जनयुद्ध, जनआंदोलन और संघीय लोकतांत्रिक गणतंत्र की स्थापना तक राज्य संरचना में व्यापक परिवर्तन हुए हैं। किंतु राजनीतिक संरचना में हुए इन परिवर्तनों ने समाज के भीतर गहराई से जड़ जमाए जातीय भेदभाव, छुआछूत तथा बच्चों के प्रति होने वाली हिंसा और भेदभाव को अपेक्षित रूप से समाप्त नहीं किया है। संविधान ने समानता, स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय की गारंटी दी है, फिर भी सामाजिक व्यवहार में आज भी असमानता, बहिष्करण और भेदभाव के अनेक रूप विद्यमान हैं।
जातीय छुआछूत और बाल उत्पीड़न नेपाली समाज की दो ऐसी सामाजिक समस्याएँ हैं, जो अलग-अलग दिखाई देती हैं, किंतु परस्पर गहराई से जुड़ी हुई हैं। इन दोनों समस्याओं का मूल स्रोत शक्ति का असंतुलन, सामाजिक वर्चस्व तथा मानवीय गरिमा का निषेध है। इसलिए इन विषयों को केवल कानूनी या प्रशासनिक समस्या के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना, सांस्कृतिक मनोविज्ञान और राज्य की ऐतिहासिक भूमिका के संदर्भ में विश्लेषित करना आवश्यक है।
जातीय भेदभाव की ऐतिहासिक संरचना
नेपाल में जातीय भेदभाव केवल एक सामाजिक प्रथा नहीं था, बल्कि यह लंबे समय तक राज्य द्वारा संरक्षित व्यवस्था भी रहा है। पारंपरिक वर्ण व्यवस्था और उस पर आधारित सामाजिक श्रेणीकरण ने कुछ समुदायों को विशेषाधिकार प्रदान किए, जबकि कुछ अन्य समुदायों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक अवसरों से व्यवस्थित रूप से वंचित किया गया। विक्रम संवत् १९१० के मुलुकी ऐन ने जातीय श्रेणीकरण को कानूनी आधार प्रदान कर भेदभाव को संस्थागत रूप दे दिया था।
समाजशास्त्रियों के अनुसार, जातीय छुआछूत केवल धार्मिक या सांस्कृतिक विषय नहीं है; यह शक्ति, संसाधनों और अवसरों पर नियंत्रण से जुड़ी सामाजिक संरचना है। इसी संरचना ने दलित तथा हाशिए पर स्थित समुदायों को शिक्षा, संपत्ति, रोजगार और राजनीतिक पहुँच से दूर रखा। परिणामस्वरूप नेपाली समाज में वर्गीय और जातीय असमानताएँ एक-दूसरे से जुड़कर विकसित हुईं।
वर्ष २०६३ विक्रम संवत् में नेपाल को छुआछूत-मुक्त राष्ट्र घोषित किया गया। इसके पश्चात संविधान तथा विभिन्न कानूनी प्रावधानों के माध्यम से भेदभाव को दंडनीय अपराध घोषित किया गया। किंतु सामाजिक रूपांतरण केवल कानूनी घोषणाओं से संभव नहीं होता। आज भी अंतरजातीय विवाहों के प्रति सामाजिक विरोध, सार्वजनिक स्थलों पर अपमानजनक व्यवहार तथा धार्मिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों में बहिष्करण की घटनाएँ समय-समय पर सामने आती रहती हैं। यह दर्शाता है कि भेदभाव का स्वरूप बदल गया है, लेकिन मानसिकता का पूर्ण रूपांतरण अभी भी नहीं हो पाया है।
बाल अधिकार और सामाजिक चेतना का प्रश्न
बच्चों के प्रति होने वाला उत्पीड़न नेपाल की एक अन्य गंभीर सामाजिक चुनौती है। बाल श्रम, बाल विवाह, यौन शोषण, घरेलू हिंसा, विद्यालयों में दुर्व्यवहार तथा मानसिक प्रताड़ना जैसी घटनाएँ यह संकेत देती हैं कि बाल अधिकारों की सुरक्षा के क्षेत्र में अभी भी लंबा रास्ता तय करना बाकी है।
नेपाल के संविधान की धारा 39 बच्चों के मौलिक अधिकारों की गारंटी देती है। बालबालिका संबंधी अधिनियम, २०७५ ने बाल संरक्षण के विभिन्न आयामों को समाहित किया है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नेपाल संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार अभिसमय का भी पक्षकार है। तथापि कानूनी व्यवस्थाओं की प्रभावशीलता सामाजिक व्यवहार और संस्थागत क्रियान्वयन पर निर्भर करती है।
बाल अधिकारों के संदर्भ में नेपाली समाज अभी भी पारंपरिक सोच से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाया है। बच्चों को स्वतंत्र व्यक्तित्व के रूप में देखने के बजाय उन्हें नियंत्रण और निर्देशन के विषय के रूप में देखने की प्रवृत्ति व्यापक है। यह बाल-अनुकूल वातावरण के निर्माण में बाधा उत्पन्न कर रही है। बाल अधिकारों की रक्षा के लिए कानूनी संरचनाओं से अधिक आवश्यक बच्चों के प्रति सम्मानपूर्ण दृष्टिकोण है।
कानून और व्यवहार के बीच की दूरी
नेपाल का संविधान विश्व के सबसे प्रगतिशील संविधानों में से एक माना जाता है। इसने समानता, सामाजिक न्याय, समावेशिता और मानवाधिकार को राज्य के मूलभूत सिद्धांतों के रूप में स्वीकार किया है। किंतु संविधान के आदर्श व्यवहार में पूर्णतः रूपांतरित नहीं हो सके हैं, जिसके कारण नागरिक उसके वास्तविक लाभों का पूर्ण अनुभव नहीं कर पा रहे हैं।
जातीय छुआछूत और बाल उत्पीड़न दोनों ही क्षेत्रों में यही समस्या दिखाई देती है। कानूनी रूप से निषिद्ध कार्य सामाजिक स्तर पर अब भी सहन किए जा रहे हैं। भेदभावपूर्ण व्यवहार को “परंपरा” के नाम पर तथा बच्चों के प्रति हिंसा को “अनुशासन” के नाम पर वैध ठहराने वाली मानसिकता आज भी विद्यमान है। यह राज्य की कानूनी व्यवस्था और सामाजिक व्यवहार के बीच गंभीर अंतर को उजागर करता है।
सामाजिक रूपांतरण की प्रक्रिया केवल दंड और सजा के माध्यम से संभव नहीं है। इसके लिए शिक्षा, जागरूकता, सांस्कृतिक पुनर्व्याख्या तथा सामाजिक संवाद आवश्यक हैं। जब तक लोगों की सोच में परिवर्तन नहीं आता, तब तक कानून केवल सीमित प्रभाव ही डाल सकता है।
राजनीतिक नेतृत्व और बौद्धिक समुदाय की जिम्मेदारी
सामाजिक न्याय का प्रश्न केवल अधिकारकर्मियों या पीड़ित समुदायों की जिम्मेदारी नहीं है। राजनीतिक नेतृत्व, बौद्धिक वर्ग, शैक्षिक संस्थान, संचार माध्यम और नागरिक समाज—सभी को इसकी जिम्मेदारी वहन करनी चाहिए। दुर्भाग्यवश नेपाली राजनीति में सामाजिक न्याय के मुद्दे प्रायः चुनावी भाषणों और नारों तक सीमित रह जाते हैं।
वास्तविक परिवर्तन के लिए राजनीतिक प्रतिबद्धता का व्यवहार में दिखाई देना आवश्यक है। विद्यालयों से लेकर विश्वविद्यालयों तक समावेशी शिक्षा का विस्तार, स्थानीय स्तर से लेकर संघीय स्तर तक प्रभावी कार्यान्वयन तथा सामाजिक चेतना के विकास हेतु कार्यक्रमों की आवश्यकता है। साथ ही बौद्धिक समुदाय को भी अनुसंधान, विमर्श और सार्वजनिक बहसों के माध्यम से भेदभाव के संरचनात्मक कारणों को उजागर करना चाहिए।
नई पीढ़ी की संभावनाएँ और चुनौतियाँ
समकालीन नेपाल में युवा पीढ़ी सामाजिक परिवर्तन की एक महत्वपूर्ण वाहक के रूप में उभरी है। सूचना प्रौद्योगिकी, वैश्वीकरण और शिक्षा के विस्तार ने नई पीढ़ी को समानता, मानवाधिकार और सामाजिक न्याय के वैश्विक मूल्यों से परिचित कराया है। किंतु केवल डिजिटल सक्रियता पर्याप्त नहीं है। सामाजिक मीडिया पर समानता के पक्ष में अभिव्यक्ति देने से अधिक महत्वपूर्ण है उसका व्यवहार में पालन करना।
यदि नई पीढ़ी जातीय, लैंगिक और वर्गीय भेदभाव के विरुद्ध वैचारिक तथा व्यावहारिक नेतृत्व प्रदान कर सके, तो नेपाली समाज में गुणात्मक परिवर्तन की अपार संभावनाएँ हैं। यही पीढ़ी पारंपरिक सामंती सोच और आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों के बीच के द्वंद्व को नई दिशा प्रदान कर सकती है।
निष्कर्ष
जातीय छुआछूत और बच्चों के प्रति होने वाला उत्पीड़न नेपाली समाज की संरचनात्मक समस्याएँ हैं, जिनका समाधान केवल कानूनी व्यवस्थाओं से संभव नहीं है। ये समस्याएँ सामाजिक चेतना, सांस्कृतिक रूपांतरण और राजनीतिक इच्छाशक्ति से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ी हुई हैं। संविधान ने समानता की आधारशिला रख दी है; अब उसे व्यवहार में स्थापित करने की ऐतिहासिक जिम्मेदारी समाज के कंधों पर है।
जब तक नेपाली समाज जन्म, जाति, वर्ग या आयु के आधार पर होने वाले भेदभाव को पूर्णतः अस्वीकार नहीं करेगा, तब तक सामाजिक न्याय का लक्ष्य अधूरा ही रहेगा। इसलिए समानता, मानवीय गरिमा और बाल अधिकारों को जीवन-व्यवहार के केंद्र में स्थापित करते हुए समतामूलक समाज निर्माण के अभियान को राष्ट्रीय प्राथमिकता का विषय बनाना आवश्यक है। यही मार्ग एक लोकतांत्रिक, समावेशी और न्यायपूर्ण नेपाल की सुदृढ़ आधारशिला का निर्माण कर सकता है।










