— देवेन्द्र किशोर ढुंगाना
नेपाल की राजनीति एक बार फिर एक महत्वपूर्ण मोड़ पर आकर खड़ी हो गई है। काठमांडू महानगर के मेयर बालेन शाह द्वारा संसद में उठाए गए सीमा-संबंधी मुद्दे और उस पर नेकपा (एमाले) की तीव्र प्रतिक्रिया ने एक बात स्पष्ट कर दी है—अब राजनीति केवल नारों से नहीं चलेगी, बल्कि संस्थागत जवाबदेही के आधार पर आगे बढ़नी होगी। लंबे समय तक सत्ता के केंद्र में रही पार्टी का अस्थिर और विचलित दिखाई देना तथा राष्ट्रीय मुद्दे पर प्रधानमंत्री स्वयं संसद के एजेंडा का विषय बन जाना, नेपाली राजनीति की बदलती प्रकृति का संकेत है।
१. मुद्दे के स्वामित्व से तथ्यात्मक जवाबदेही की ओर
सन् २०१५ के बाद नेपाल में “राष्ट्रवाद” को एक राजनीतिक पूंजी के रूप में लगातार उपयोग किया गया। नया नक्शा पारित करना, सीमा की रक्षा करना जैसे नारों ने मतदाताओं को आकर्षित किया। लंबे समय तक इस राजनीतिक पूंजी पर एमाले का प्रभावी स्वामित्व रहा। किंतु बालेन शाह के हस्तक्षेप ने इस स्वामित्व की राजनीति को चुनौती दी है। अब प्रश्न यह नहीं रह गया है कि मुद्दा किसका है, बल्कि यह है कि उस मुद्दे पर तथ्य क्या हैं, प्रमाण क्या हैं और सरकार ने वास्तव में क्या किया है।
यह परिवर्तन साधारण नहीं है। जनता अब यह देखने से आगे बढ़ रही है कि “किसने अधिक जोर से आवाज़ उठाई”, और यह जानना चाहती है कि “किसने प्रमाण और आंकड़े प्रस्तुत किए”। संसद के भीतर राजनीतिक उत्तेजना बढ़ रही थी, वहीं सामाजिक माध्यमों पर लोग पुराने नक्शे, सीमा-स्तंभों के विवरण और 1816 की सुगौली संधि से संबंधित दस्तावेज़ खोज रहे थे। यह संकेत है कि राजनीति को अब भावनात्मक अपील से आगे बढ़कर तथ्य-आधारित विमर्श की ओर जाना ही होगा। जो पक्ष तथ्य प्रस्तुत नहीं कर पाएगा, वह मुद्दे पर अपनी पकड़ खो देगा।
२. सत्ता से बाहर होने के बाद पहचान का संकट
जो राजनीतिक दल लंबे समय तक सत्ता में रहता है, उसके लिए विपक्ष में जाने के बाद सबसे बड़ी चुनौती अपनी राजनीतिक पहचान को बनाए रखना होता है। वर्तमान में एमाले की तीखी प्रतिक्रियाएँ इसी पहचान-संकट की अभिव्यक्ति प्रतीत होती हैं। सत्ता में रहते हुए स्वयं को “राष्ट्रवाद का संरक्षक” बताने वाली पार्टी को तब असहजता महसूस होती है जब वही मुद्दा कोई दूसरा राजनीतिक या सामाजिक अभिनेता उठाता है।
यह विचलन केवल बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक भी है। पार्टी के भीतर पारंपरिक संगठनात्मक शैली और नई जन-अपेक्षाओं के बीच का संघर्ष उसके स्वर को एकरूप नहीं होने दे रहा है। कोई बालेन को राष्ट्रविरोधी कहता है, कोई उनसे तथ्य प्रस्तुत करने की मांग करता है, तो कोई सरकार को घेरने का प्रयास करता है। इस प्रकार की बहुविध प्रतिक्रियाएँ आम जनता के सामने पार्टी को असंगठित और भ्रमित रूप में प्रस्तुत करती हैं।
राजनीति में ऐसी स्थिति केवल कमजोरी नहीं होती; यह अवसर भी बन सकती है। किंतु यदि इस अवसर को संस्थागत बहस और नीति-आधारित संवाद में परिवर्तित नहीं किया गया, तो केवल उत्तेजना ही शेष रह जाएगी।
३. नए राजनीतिक अभिनेताओं का उदय: संस्थाओं के बाहर से भीतर तक
इस संदर्भ में बालेन शाह की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। वे पारंपरिक दलगत संरचना से नहीं आए हैं। एक महानगर के मेयर के रूप में राष्ट्रीय सीमा जैसे संवेदनशील विषय पर मुखर होना दो महत्वपूर्ण संदेश देता है।
पहला, अब स्थानीय स्तर के नेता भी राष्ट्रीय नीतिगत प्रश्नों पर प्रभावशाली भूमिका निभा सकते हैं। दूसरा, जनता राजनीतिक दलों के टिकट से अधिक व्यक्ति के कार्य और उसकी सार्वजनिक प्रतिबद्धता को महत्व देने लगी है।
इस परिवर्तन ने नेपाली राजनीति में लंबे समय से बने कुछ एकाधिकारों को चुनौती दी है। पहले राष्ट्रवाद, विदेश नीति और सुरक्षा जैसे विषयों पर बोलने का अधिकार मुख्यतः कुछ बड़े राजनीतिक दलों तक सीमित माना जाता था। अब काठमांडू का मेयर, धनगढ़ी का पत्रकार या तातोपानी का व्यापारी भी राष्ट्रीय प्रश्नों पर जवाब मांग सकता है। यह लोकतांत्रिक विस्तार का संकेत है।
हालाँकि, इसके साथ जोखिम भी जुड़े हैं। यदि तथ्य और विशेषज्ञता के स्थान पर केवल भावनाएँ और आवेग हावी हो जाएँ, तो कूटनीतिक संबंधों को नुकसान पहुँच सकता है। इसलिए नए राजनीतिक अभिनेताओं की जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी है जितनी उनकी संभावनाएँ।
४. बदलती जन-अपेक्षाएँ: नारों से परिणामों की ओर
सन् २००६ के बाद की राजनीति ने जनता को बड़े सपने दिखाए—गणतंत्र, संविधान और संघीय व्यवस्था। अब जनता छोटे लेकिन ठोस परिणाम चाहती है। लोग जानना चाहते हैं कि सीमा-स्तंभ सुरक्षित हैं या नहीं, विदेश जाने पर वीज़ा प्रक्रिया में कठिनाई क्यों है, और राजधानी में नियमित जलापूर्ति कब होगी।
जन-अपेक्षाओं में यह बदलाव राजनीतिक शैली को भी बदल रहा है। अब केवल यह कह देना पर्याप्त नहीं है कि “हम राष्ट्रवादी हैं।” राजनीतिक दलों को यह प्रमाणित करना होगा कि उन्होंने वास्तव में क्या कार्य किए हैं। उदाहरण के लिए, यदि किसी सीमा-स्तंभ की मरम्मत कराई गई है, तो उसका प्रमाण जनता के सामने प्रस्तुत करना होगा।
एमाले की उत्तेजित प्रतिक्रिया और सरकार की चुप्पी दोनों ही जनता को निराश कर रही हैं, क्योंकि लोगों को ठोस परिणाम नहीं दिख रहे हैं; वे केवल राजनीतिक बयान सुन रहे हैं।
५. आगे का मार्ग: हठ से संवाद की ओर
बदलते राजनीतिक परिवेश में प्रत्येक शक्ति-केंद्र की भूमिका को पुनर्परिभाषित करने की आवश्यकता है।
सत्तारूढ़ दल की भूमिका:-
सत्तारूढ़ दल का दायित्व केवल राजनीतिक उत्तेजना को नियंत्रित करना नहीं है, बल्कि तथ्यों के आधार पर बहस का स्तर ऊँचा उठाना है। सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि उसने सीमा-संबंधी मुद्दों पर क्या कदम उठाए हैं। इस संदर्भ में एक विस्तृत श्वेतपत्र संसद में प्रस्तुत करना समय की मांग है। मौन रहने से केवल संदेह बढ़ता है।
विपक्षी एमाले की भूमिका:-
विपक्ष का दायित्व केवल आक्रोश प्रकट करना नहीं है। उसे अपने शासनकाल के अनुभव का उपयोग करते हुए व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत करने चाहिए। राष्ट्रवाद पर स्वामित्व का दावा करने के बजाय उसके संस्थागत संरक्षण के लिए ठोस नीति-रोडमैप देना अधिक उपयोगी होगा।
बालेन जैसे नए नेताओं की भूमिका:-
नए नेताओं का कार्य केवल मुद्दे उठाना नहीं, बल्कि सरकार, विशेषज्ञों और संबंधित पक्षों के साथ मिलकर समाधान का खाका तैयार करना भी है। आवेग किसी बहस की शुरुआत कर सकता है, किंतु स्थायी समाधान केवल संवाद और सहयोग से ही संभव है।
जनता की भूमिका
जनता को भी अपनी राजनीतिक अपेक्षाओं में परिवर्तन लाना होगा। किसी दल की विजय को प्राथमिकता देने के बजाय राष्ट्रीय हितों और सार्वजनिक परिणामों पर प्रश्न पूछने की संस्कृति विकसित करनी होगी। नेताओं की प्रशंसा करने से अधिक महत्वपूर्ण है उनसे तथ्य, आंकड़े और जवाबदेही की मांग करना।
अन्त में,बालेन शाह के एक वक्तव्य और एमाले की एक तीखी प्रतिक्रिया ने नेपाली राजनीति को स्वयं का प्रतिबिंब देखने का अवसर दिया है। उस प्रतिबिंब में हमने देखा कि पुराने राजनीतिक दल असमंजस में हैं, नए नेता अधीर हैं और जनता अभी भी स्पष्ट दिशा की तलाश में है। फिर भी, यही अव्यवस्था एक नई राजनीतिक संस्कृति के जन्म का आधार बन सकती है।
अब राजनीति “मेरे हठ” की नहीं, बल्कि “हमारे तथ्य” की होनी चाहिए। यह इस बात की प्रतिस्पर्धा नहीं होनी चाहिए कि मुद्दा किसने उठाया, बल्कि इस बात पर केंद्रित होनी चाहिए कि उसका समाधान कैसे किया गया। आज के दौर में राष्ट्रवाद का अर्थ सार्वजनिक मंचों पर ऊँची आवाज़ में बोलना नहीं, बल्कि संसद में प्रमाण और जवाबदेही प्रस्तुत करना है।
नेपाल की राजनीति जटिल है क्योंकि वह संक्रमण के दौर से गुजर रही है। हर संक्रमण अपने साथ पीड़ा लेकर आता है, किंतु परिपक्वता भी उसी प्रक्रिया से प्राप्त होती है। यदि हम इस जटिलता से निकलकर व्यक्तिवाद से संस्थावाद की ओर यात्रा आरंभ कर सकें, तो बालेन शाह की पहल और एमाले की प्रतिक्रिया—दोनों की सार्थकता सिद्ध होगी। अन्यथा आने वाली पीढ़ियों को भी इसी बिंदु से अपनी राजनीतिक यात्रा पुनः प्रारंभ करनी पड़ेगी।
देश को नेताओं की आवश्यकता है, लेकिन नेताओं से भी अधिक आवश्यकता मजबूत संस्थाओं की है। और उन संस्थागत संस्कारों के निर्माण का समय अभी है।
भद्रपुर, नेपाल










