असम: डिब्रूगढ़ में ‘उल्फा’ के नाम पर चंदा आतंक

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डिब्रूगढ़: असम के डिब्रूगढ़ क्षेत्र में एक बार फिर प्रतिबंधित उग्रवादी संगठन अल्फ़ा (इंडिपेंडेंट ) यानी उल्फा (आई) के नाम का दुरुपयोग कर जबरन चंदा वसूली करने वाले गिरोह के सक्रिय होने की घटना ने स्थानीय समाज में भय और असुरक्षा का माहौल पैदा कर दिया है। पुलिस द्वारा तीन युवकों की गिरफ्तारी के बाद यह मामला केवल आपराधिक गतिविधि तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सामाजिक मनोविज्ञान और सुरक्षा व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े करता दिखाई दे रहा है।
घटना के तौर-तरीकों को देखकर स्पष्ट होता है कि अपराधियों ने उग्रवादी संगठन का नाम इस्तेमाल कर लोगों में दहशत फैलाने की रणनीति अपनाई। विशेष रूप से एक चिकित्सक से ६० लाख रुपये की मांग करते हुए धमकी भरे फोन कॉल और एसएमएस भेजना सामान्य आर्थिक अपराध से कहीं अधिक सुनियोजित मानसिक दबाव बनाने का प्रयास था। इससे यह महसूस होता है कि असम के ऊपरी इलाकों में उग्रवाद की पुरानी छाया अब भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।
डिब्रूगढ़ और शिवसागर क्षेत्रों में इस तरह की घटनाओं के दोबारा सामने आने से व्यापारी, डॉक्टर और कारोबारी वर्ग में भय का वातावरण बनने लगा है। उग्रवादी संगठन के नाम पर चंदा वसूली करने वाले गिरोहों की सक्रियता राज्य की सुरक्षा व्यवस्था के लिए भी चुनौतीपूर्ण संकेत मानी जा रही है। हालांकि डीएसपी नयन मोनी बरुआ के नेतृत्व में पुलिस द्वारा त्वरित कार्रवाई कर आरोपियों को गिरफ्तार करना एक सकारात्मक पहल माना जा रहा है।
यह घटना एक महत्वपूर्ण संदेश भी देती है कि उग्रवाद की वास्तविक ताकत भले कमजोर पड़ गई हो, लेकिन उसका नाम आज भी अपराधियों के लिए “हथियार” बना हुआ है। इसलिए अब केवल गिरफ्तारी और जांच तक सीमित रहने के बजाय जनजागरूकता, साइबर निगरानी और स्थानीय सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत करने की आवश्यकता महसूस की जा रही है। असम में शांति बहाल होने के दावों के बावजूद ऐसी घटनाएं यह संकेत देती हैं कि समाज में भय की राजनीति अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।

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