जीवन शर्मा: सिक्किम-दार्जिलिंग की सांस्कृतिक निरंतरता और गोर्खा पहचान की जीवंत अभिव्यक्ति

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देवेंद्र के. ढुंगाना

सिक्किम और दार्जिलिंग क्षेत्र नेपाली भाषा, साहित्य, कला और संस्कृति की उर्वर भूमि के रूप में लंबे समय से परिचित रहे हैं। इस भूभाग में विकसित सांस्कृतिक चेतना केवल भौगोलिक सीमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह विश्वभर में फैले गोर्खा समुदाय की पहचान निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रही है। इसी संदर्भ में जीवन शर्मा समकालीन समय के ऐसे बहुआयामी स्रष्टा हैं, जिन्होंने परंपरागत धरोहर को संरक्षित रखते हुए आधुनिक युग के साथ संवाद करने वाला एक सृजनात्मक सेतु निर्मित किया है।
जीवन शर्मा का परिचय केवल गायक या संगीतकार के रूप में सीमित नहीं है। गीतकार, उपन्यासकार, सांस्कृतिक अभियंता और प्रशासनिक जिम्मेदारियों को निभाने वाले व्यक्तित्व के रूप में उनकी बहुआयामी उपस्थिति उल्लेखनीय है। सिक्किम सरकार के मार्केटिंग फेडरेशन में महाप्रबंधक की जिम्मेदारी संभालते हुए भी उन्होंने अपनी सृजनात्मक यात्रा को निरंतर बनाए रखा है, जो अनुशासन और समर्पण का प्रेरणादायक उदाहरण है। सिक्किम साहित्य परिषद के पूर्व महासचिव के रूप में उन्होंने भाषा और साहित्य के संस्थागत विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
दार्जिलिंग–सिक्किम क्षेत्र के ऐतिहासिक योगदान का उल्लेख किए बिना जीवन शर्मा का मूल्यांकन अधूरा रहेगा। इस भूभाग ने नेपाली साहित्य में इंद्रबहादुर राई जैसी वैचारिक परंपरा, अगम सिंह गिरी की काव्य चेतना और संगीत में अंबर गुरूंग जैसे महान प्रतिभाओं को जन्म दिया है। इन स्रष्टाओं द्वारा निर्मित सांस्कृतिक आधार हाल के समय में कुछ हद तक ओझल होता प्रतीत होता है, ऐसे में जीवन शर्मा जैसे स्रष्टाओं की सक्रियता सांस्कृतिक निरंतरता का संकेत देती है।
उनके गीत—‘माटोको सुभास’, ‘टुटेको विश्वास’, ‘यो मन मान्दैन’, ‘जीवन रहरमै’—सिर्फ शब्द और धुन का संयोजन नहीं हैं, बल्कि वे समाज, भावना और समय की अभिव्यक्ति हैं। स्वरूपराज आचार्य और अंजु पंत जैसे स्थापित कलाकारों के साथ उनके सहयोग ने उनकी रचनाओं को व्यापक श्रोताओं तक पहुँचाया है। वहीं ‘आऊ हामी प्रेम गरौं’ और ‘डाँडापाखा हरियाली’ जैसे गीत नेपाली जीवनशैली, प्रकृति और भावनात्मक संसार को सजीव रूप में प्रस्तुत करते हैं।
संगीत के साथ-साथ साहित्य में भी उनकी उपस्थिति सशक्त है। ‘इनविंसिबल लव’ और ‘मेमोरी ऑफ सेवियर’ जैसे उपन्यास जीवन, प्रेम, पीड़ा और सामाजिक यथार्थ के विविध आयामों को सामने लाते हैं। इससे वे केवल मनोरंजनकर्मी नहीं, बल्कि एक विचारशील स्रष्टा के रूप में स्थापित होते हैं। उनके लेखन में व्यक्तिगत अनुभूति और सामाजिक यथार्थ के बीच संतुलन स्पष्ट रूप से दिखाई देता है, जो समकालीन साहित्य की एक महत्वपूर्ण विशेषता है।
हालाँकि, जीवन शर्मा की सृजनात्मक दृष्टि केवल रचना तक सीमित नहीं है; उसमें एक आलोचनात्मक चेतना भी निहित है। वर्तमान ‘वायरल’ संस्कृति के प्रति उनकी चिंता गहरी है। तकनीकी विकास ने सृजन को सरल बनाया है, लेकिन इसके कारण कला और संगीत की आत्मा प्रभावित हो रही है—ऐसा उनका मानना है। ऑटो-ट्यून और क्षणिक लोकप्रियता पर आधारित प्रवृत्तियाँ दीर्घकालीन साधना को पीछे धकेल रही हैं। इस संदर्भ में उन्होंने साधना, अध्ययन और निरंतरता के महत्व पर जो बल दिया है, वह समकालीन सर्जकों के लिए मार्गदर्शक संदेश है।
गोर्खा समाज के ऐतिहासिक संदर्भ में देखा जाए तो भाषा और संस्कृति का संरक्षण हमेशा एक चुनौती रहा है। भारत में बसे नेपालीभाषी समुदाय ने अपनी पहचान को बनाए रखने के लिए साहित्य, संगीत और सांस्कृतिक आंदोलनों का सहारा लिया है। इस संघर्षपूर्ण यात्रा में जीवन शर्मा जैसे स्रष्टाओं की भूमिका केवल रचनात्मक नहीं, बल्कि पहचान के संरक्षण से भी जुड़ी हुई है। उनकी रचनाएँ गोर्खा समुदाय की भावनात्मक और सांस्कृतिक वास्तविकताओं को अभिव्यक्त करती हैं।
प्रशासनिक जिम्मेदारियों और सृजनात्मक यात्रा के बीच संतुलन बनाए रखना आसान नहीं है, लेकिन जीवन शर्मा ने इसे अपनी जीवनशैली का हिस्सा बना लिया है। अपने कार्यक्षेत्र के बाद शेष समय को संगीत और साहित्य को समर्पित करने की उनकी प्रवृत्ति निरंतरता और अनुशासन के महत्व को स्पष्ट करती है। यही निरंतरता उन्हें समकालीन स्रष्टाओं के बीच विशिष्ट बनाती है।
अंततः, जीवन शर्मा केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक प्रवृत्ति, एक सांस्कृतिक चेतना और एक सेतु हैं—जो अतीत, वर्तमान और भविष्य को जोड़ने का कार्य कर रहे हैं। सिक्किम–दार्जिलिंग की सांस्कृतिक विरासत को पुनर्जीवित करते हुए उसे नई पीढ़ी तक पहुँचाने का उनका प्रयास न केवल सराहनीय, बल्कि अत्यंत आवश्यक भी है। उनकी रचनाएँ स्मृतियों को जीवंत बनाते हुए भविष्य के लिए प्रेरणा का स्रोत प्रदान करती हैं। इस दृष्टि से जीवन शर्मा समकालीन नेपाली कला, साहित्य और संगीत के महत्वपूर्ण संवाहक के रूप में स्थापित होते हैं।

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