मध्यपूर्व का युद्धविराम और चीन की उभरती भूमिका: क्या विश्व राजनीति नए ध्रुवीकरण की ओर?

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देवेंद्र किशोर ढुंगाना

मध्यपूर्व लंबे समय से विश्व शक्तियों की प्रतिस्पर्धा का केंद्र रहा है। तेल, भू-राजनीतिक स्थिति और धार्मिक–राजनीतिक जटिलताओं के कारण यहां का हर संघर्ष वैश्विक राजनीति पर गहरा प्रभाव डालता है। हाल ही में ईरान और अमेरिका के बीच हुआ दो सप्ताह का युद्धविराम केवल एक क्षेत्रीय घटना नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन में हो रहे बदलाव का संकेत भी माना जा रहा है। इस घटनाक्रम में पाकिस्तान के साथ-साथ चीन का नाम जुड़ना, और स्वयं अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा चीन की भूमिका को स्वीकार करना, विश्व राजनीति में नए ध्रुवीकरण की शुरुआत का संकेत दे सकता है।
ट्रंप के अनुसार चीन ने ईरान को बातचीत के लिए राजी करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हालांकि चीन ने इसे स्पष्ट रूप से स्वीकार नहीं किया है, लेकिन उसने “शांति और स्थिरता के लिए रचनात्मक भूमिका” निभाने की बात कही है। यह भले ही कूटनीतिक भाषा हो, पर इसका अर्थ गहरा है—चीन अब केवल एक आर्थिक शक्ति नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीतिक मुद्दों में प्रभाव डालने वाली रणनीतिक शक्ति बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
मध्यपूर्व में चीन की सक्रियता नई नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में चीन ने “बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI)” के माध्यम से क्षेत्रीय देशों के साथ आर्थिक और अवसंरचनात्मक संबंध मजबूत किए हैं। सऊदी अरब और ईरान के बीच संबंध सुधार में चीन की मध्यस्थता पहले ही वैश्विक स्तर पर देखी जा चुकी है। इसलिए ईरान–अमेरिका तनाव कम करने में चीन की संभावित पर्दे के पीछे की भूमिका असामान्य नहीं मानी जा सकती।
इस घटनाक्रम में पाकिस्तान की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि उन्होंने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ और सेना प्रमुख आसिम मुनीर से बातचीत के बाद युद्धविराम का निर्णय लिया। चीन–पाकिस्तान के करीबी संबंधों को देखते हुए, इन दोनों देशों द्वारा संयुक्त रूप से मध्यपूर्व में शांति पहल की बात एक समन्वित रणनीतिक प्रयास का संकेत देती है। चीन–पाकिस्तान का पांच सूत्रीय प्रस्ताव भले ही सार्वजनिक नहीं किया गया हो, लेकिन इसका कूटनीतिक अर्थ स्पष्ट है—अमेरिकी प्रभाव वाले क्षेत्र में एक वैकल्पिक शक्ति समूह का उभरना।
युद्धविराम की शर्तें भी ध्यान आकर्षित करती हैं। ईरान द्वारा रखी गई बताई जाने वाली शर्तें—जैसे अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप पर रोक की गारंटी, यूरेनियम संवर्धन की मान्यता, प्रतिबंधों का हटना और क्षेत्र से अमेरिकी सैनिकों की वापसी—यदि आंशिक रूप से भी स्वीकार की गई हैं, तो यह शक्ति संतुलन में बदलाव का संकेत है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि अमेरिका अब एकतरफा शर्तें थोपने की स्थिति में नहीं है, बल्कि उसे बहुपक्षीय दबाव और कूटनीतिक संतुलन के साथ आगे बढ़ना पड़ रहा है।
चीन के विदेश मंत्री वांग यी द्वारा विभिन्न देशों के साथ 26 बार संवाद किए जाने का तथ्य भी चीन की सक्रिय कूटनीति को दर्शाता है। हालांकि अमेरिका और भारत के साथ सीधे संवाद का उल्लेख न होना अपने आप में महत्वपूर्ण है। इससे संकेत मिलता है कि चीन अपने प्रभाव क्षेत्र को अलग ढंग से विकसित कर रहा है, जहां वह अपने सहयोगी देशों के माध्यम से प्रभाव विस्तार कर रहा है।
यदि इस घटनाक्रम को व्यापक वैश्विक संदर्भ में देखा जाए, तो यह “एकध्रुवीय विश्व” से “बहुध्रुवीय विश्व” की ओर संक्रमण का संकेत है। शीत युद्ध के बाद अमेरिका एकमात्र महाशक्ति के रूप में उभरा था, लेकिन अब चीन और कुछ हद तक रूस जैसी शक्तियों के उभार से वैश्विक शक्ति संतुलन बदल रहा है। ईरान–अमेरिका युद्धविराम में चीन की संभावित भूमिका इस परिवर्तन का एक जीवंत उदाहरण है।
इसके अलावा, ट्रंप की प्रस्तावित चीन यात्रा को भी इस संदर्भ में देखा जा सकता है। अमेरिका और चीन के संबंध इस समय प्रतिस्पर्धा और सहयोग—दोनों के बीच संतुलन बनाए हुए हैं। ऐसे में मध्यपूर्व जैसे संवेदनशील क्षेत्र में चीन की सक्रियता अमेरिका के लिए चुनौती भी है और अवसर भी।
मध्यपूर्व के देशों के लिए भी यह बदलाव महत्वपूर्ण है। अब वे केवल पश्चिमी शक्तियों पर निर्भर नहीं रहना चाहते, बल्कि वैकल्पिक साझेदारों की तलाश में हैं। चीन अपनी “हस्तक्षेप न करने की नीति” और “आर्थिक सहयोग” के आधार पर खुद को एक विश्वसनीय साझेदार के रूप में प्रस्तुत कर रहा है, जो कई देशों को आकर्षित कर रहा है।
हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम को अत्यधिक आशावादी दृष्टिकोण से देखना उचित नहीं होगा। यह युद्धविराम अस्थायी है और इसकी शर्तों का वास्तविक क्रियान्वयन अभी अनिश्चित है। साथ ही, चीन की भूमिका कितनी निर्णायक थी, इस पर भी स्पष्ट प्रमाण सामने नहीं आए हैं। इसलिए इसे “संभावित परिवर्तन का संकेत” मानना अधिक संतुलित दृष्टिकोण होगा।
अंततः, ईरान–अमेरिका युद्धविराम केवल एक क्षेत्रीय कूटनीतिक सफलता नहीं, बल्कि बदलती विश्व राजनीति का एक महत्वपूर्ण संकेत है। चीन की भागीदारी, पाकिस्तान की सक्रियता और अमेरिका का अपेक्षाकृत लचीला रुख—ये सभी मिलकर एक नए वैश्विक शक्ति संतुलन की रूपरेखा प्रस्तुत करते हैं। यदि ऐसे घटनाक्रम आगे भी जारी रहते हैं, तो निकट भविष्य में विश्व राजनीति के बहुध्रुवीय स्वरूप में स्पष्ट परिवर्तन देखने को मिल सकता है।

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