खरसांग: चिकित्सा विज्ञान के एक विशिष्ट और प्रेरणादायी व्यक्तित्व, पद्मश्री डॉ. मणिकुमार छेत्री का १०६ वर्ष की आयु में गत 5 अप्रैल को हुआ निधन न केवल गोरखा समुदाय, बल्कि पूरे भारतीय आयुर्विज्ञान जगत को गहरे शोक में डुबो गया है। उनका दीर्घ जीवन केवल समय की दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सेवा, समर्पण और उपलब्धियों के आधार पर भी असाधारण रहा।
२३ मई १९२० को दार्जिलिंग के टिस्टा वैली चाय बागान में जन्मे डॉ. छेत्री ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा दार्जिलिंग में ही पूरी की और कोलकाता से चिकित्सा विज्ञान में उच्च शिक्षा प्राप्त की। अपनी मेहनत, अनुशासन और पेशागत निष्ठा के बल पर उन्होंने चिकित्सा क्षेत्र में एक विशिष्ट पहचान बनाई। वर्ष १९७४ में पद्मश्री से सम्मानित होने वाले वे पहले गोरखा चिकित्सक थे, जिसने गोरखा समुदाय का गौरव राष्ट्रीय स्तर पर ऊंचा किया।
हृदय रोग विशेषज्ञ के रूप में उन्होंने लंबे समय तक सेवा दी और पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु के निजी चिकित्सक के रूप में भी कार्य किया। वर्ष १९७६ में पश्चिम बंगाल सरकार के स्वास्थ्य विभाग के निदेशक पद तक पहुंचने वाले वे पहले गोरखा बने, जिससे उन्होंने प्रशासनिक और नीतिगत स्तर पर भी महत्वपूर्ण योगदान दिया।
उनका जीवन केवल पेशागत उपलब्धियों तक सीमित नहीं था; वे समाज के प्रति उत्तरदायी, कर्तव्यनिष्ठ और प्रेरणास्पद व्यक्तित्व के रूप में जाने जाते थे। पिछले वर्ष मंगपू में ‘हिमाली गौरव सम्मान’ से सम्मानित किया जाना उनके जीवनभर के योगदान के प्रति समाज की उच्च सराहना का प्रतीक है।
गोरखा जन पुस्तकालय, खरसांग ने उनके निधन पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए एक विज्ञप्ति के माध्यम से श्रद्धांजलि अर्पित की है। पुस्तकालय के मुख्य सचिव विनोद रसाइली ने डॉ. छेत्री के योगदान को याद करते हुए कहा कि उनका अभाव चिकित्सा क्षेत्र और गोरखा समाज के लिए अपूरणीय है।
डॉ. मणिकुमार छेत्री का जीवन सेवा, समर्पण और पहचान का एक सशक्त उदाहरण है। उनके आदर्श और योगदान आने वाली पीढ़ियों को निरंतर प्रेरित करते रहेंगे।











