कोलकाता(शुभाशिष विश्वास): पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया के दौरान न्यायाधीशों पर हमले की घटना पर सर्वोच्च न्यायालय ने सख्त रुख अपनाया है। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत के नेतृत्व में न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल पंचोली की पीठ ने गुरुवार को निर्देश दिया कि इस घटना को न्यायालय पर सीधा हमला माना जाए और इसकी जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो या राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण को सौंपी जाए। न्यायालय ने यह भी कहा कि न्यायाधीशों पर हमला केवल कानून-व्यवस्था का मामला नहीं है, बल्कि यह न्याय व्यवस्था पर सीधा प्रहार है, जिसे किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जाएगा।
उल्लेखनीय है कि बुधवार रात मालदा जिले के एक गांव में विशेष पुनरीक्षण कार्य में लगे सात न्यायाधीशों को कई घंटों तक घेर कर रखा गया। उन्हें छुड़ाकर वापस लाने के दौरान उनके वाहनों पर पत्थरबाजी किए जाने के भी आरोप लगे। इन सात न्यायाधीशों में तीन महिलाएं भी शामिल थीं, जिन्हें लंबे समय तक बंधक बनाकर रखा गया। कोलकाता उच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश सुजय पाल द्वारा भेजे गए पत्र के आधार पर सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि स्थिति इतनी गंभीर हो गई थी कि देर रात गृह सचिव और पुलिस महानिदेशक को प्रधान न्यायाधीश के आवास पर पहुंचना पड़ा। रात बारह बजे के बाद ही इन न्यायाधीशों को मुक्त कराया जा सका।
और भी चिंताजनक बात यह रही कि छुड़ाकर वापस लाते समय न्यायाधीशों के वाहनों पर पथराव किया गया। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने अवलोकन में कहा कि यह केवल न्यायाधीशों को डराने का प्रयास नहीं, बल्कि न्यायालय की सत्ता पर सीधा प्रहार है। इसके बाद न्यायालय ने स्पष्ट किया कि कोई भी व्यक्ति कानून को अपने हाथ में नहीं ले सकता और तुरंत न्यायाधीशों की सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए। न्यायालय ने यह भी कहा कि विशेष पुनरीक्षण कार्य में लगे न्यायाधीश न्यायालय के “विस्तारित हाथ” के रूप में कार्य कर रहे हैं, और उन्हें रोकना न्याय व्यवस्था पर हमला है।
कालियाचक के प्रखंड विकास अधिकारी के कार्यालय में सात न्यायाधीशों को बंधक बनाए जाने की घटना को लेकर न केवल राज्य की राजनीति में बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी तीखी प्रतिक्रिया शुरू हो गई है। गुरुवार सुबह यह मामला सर्वोच्च न्यायालय के संज्ञान में आया। उसी दिन विशेष पुनरीक्षण से संबंधित मामले की सुनवाई थी। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल पंचोली की पीठ में सुनवाई शुरू होते ही पश्चिम बंगाल के पुलिस और प्रशासन पर सवाल उठने लगे।
स्थिति की गंभीरता को रेखांकित करते हुए प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने अधिवक्ता कपिल सिब्बल और मेनका गुरुस्वामी से पूछा, “क्या आपने देखा कि क्या हुआ?” इसके उत्तर में कपिल सिब्बल ने कहा कि उन्होंने रिपोर्ट पढ़ी है।
न्यायालय में केंद्र के प्रधान विधि अधिकारी तुषार मेहता ने कड़ा विरोध जताते हुए कहा कि इस प्रकार की घटना किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं है। दूसरी ओर याचिकाकर्ताओं की ओर से मेनका गुरुस्वामी ने कहा कि यह “अराजनीतिक विरोध” था। हालांकि प्रधान न्यायाधीश ने स्पष्ट कर दिया कि न्यायालय इस मामले को राजनीतिक रंग नहीं देना चाहता।
इस बीच न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने टिप्पणी की, “जिन पर कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी है, उन्हें और अधिक सतर्क रहना चाहिए था। समय पर प्रशासनिक हस्तक्षेप क्यों नहीं हुआ?” प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने यह भी कहा कि रात ११ बजे तक संबंधित जिला प्रशासन का कोई प्रतिनिधि मौजूद नहीं था।
इस घटना के संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय ने कई महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए:
पहला, न्यायाधीशों के ठहरने के स्थानों, सरकारी अतिथि गृहों सहित, पर्याप्त सुरक्षा की व्यवस्था की जाए।
दूसरा, यदि किसी न्यायाधीश के परिवार की सुरक्षा को लेकर कोई आशंका हो तो तुरंत मूल्यांकन कर आवश्यक कदम उठाए जाएं।
तीसरा, किसी भी स्थान पर पांच से अधिक लोगों के एकत्र होने पर रोक लगाई जाए।
इसके अतिरिक्त इस घटना के लिए राज्य के मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक, जिला मजिस्ट्रेट और पुलिस अधीक्षक को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है। उनसे पूछा गया है कि उनके विरुद्ध कार्रवाई क्यों न की जाए। साथ ही ६ अप्रैल को उन्हें दूरसंचार माध्यम से न्यायालय में उपस्थित रहने का निर्देश दिया गया है।
सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि इस प्रकार की घटना न्यायालय की अवमानना के दायरे में आ सकती है और भविष्य में इस तरह का व्यवहार किसी भी स्थिति में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। अर्थात, कालियाचक की यह घटना अब केवल कानूनी विवाद तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसमें प्रशासनिक विफलता और सुरक्षा से जुड़े गंभीर प्रश्न भी शामिल हो गए हैं।









