हड़बड़ी, दमन और प्रतिवाद: बालेन सरकार की पहली बड़ी परीक्षा

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देवेंद्र के. ढुंगाना

काठमाण्डोंँ: नेपाल की समकालीन राजनीति में एक बार फिर सत्ता और विपक्ष के बीच का तनाव केवल सतही स्तर पर नहीं, बल्कि संरचनात्मक स्तर तक पहुँचता हुआ दिखाई दे रहा है। नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एमाले) द्वारा अपने अध्यक्ष केपी शर्मा ओली की गिरफ्तारी के विरोध में राजनीतिक और कानूनी प्रतिवाद को निरंतर जारी रखने का निर्णय केवल एक दलगत प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि वर्तमान राजनीतिक दिशा पर उठाया गया गंभीर प्रश्न भी है।
रास्वपा के नेतृत्व में बनी बालेन सरकार के लिए यह घटनाक्रम एक प्रारंभिक किंतु अत्यंत संवेदनशील परीक्षा बन गया है। सरकार गठन के थोड़े ही समय में इस तरह की उच्चस्तरीय गिरफ्तारियाँ, वह भी प्रमुख विपक्षी दल के शीर्ष नेताओं से जुड़ी हुई, स्वाभाविक रूप से राजनीतिक हलचल पैदा करने वाली हैं। एमाले ने इसे “सरकारी दमन” और “राज्य आतंक की ओर संकेत” के रूप में व्याख्यायित किया है, जबकि सरकार पक्ष संभवतः इसे कानूनी प्रक्रिया और जवाबदेही के दायरे में रखने की कोशिश कर रहा है। यहीं से मूल टकराव की रेखा खिंचती है- कानून का शासन बनाम राजनीतिक प्रतिशोध का बीज।
गिरफ्तारी की प्रक्रिया पर उठे सवाल केवल ‘क्यों’ तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ‘कैसे’ और ‘कितनी हड़बड़ी में’ जैसे प्रश्न भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में कानून का शासन सर्वोपरि होता है, लेकिन उसकी प्रक्रिया पारदर्शी, विश्वसनीय और समयानुकूल भी होनी चाहिए। यदि कोई कदम ‘ड्यू प्रोसेस’ (प्रक्रियागत न्याय) पर संदेह उत्पन्न करता है, तो वह निर्णय की वैधता को ही कमजोर कर देता है। इसी संदर्भ में यह राजनीतिक कहावत फिर प्रासंगिक हो उठती है- “हड़बड़ी में लिया गया निर्णय अक्सर आत्मघाती साबित होता है।”
जेन-जी आंदोलन के संदर्भ में तत्कालीन प्रधानमंत्री ओली को “मुख्य सूत्रधार” के रूप में प्रस्तुत करते हुए की गई गिरफ्तारी ने सरकार की मंशा पर अतिरिक्त प्रश्नचिह्न खड़े किए हैं। क्या यह कदम ठोस प्रमाण और विस्तृत जांच का परिणाम है, या फिर जनदबाव और राजनीतिक संदेश देने की जल्दबाजी में उठाया गया निर्णय? यदि दूसरा पक्ष अधिक प्रभावी दिखता है, तो इससे सरकार की नैतिक आधारशिला कमजोर हो सकती है।
दूसरी ओर, एमाले की प्रतिक्रिया भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। पार्टी ने कानूनी और राजनीतिक दोनों माध्यमों से प्रतिवाद करने की रणनीति अपनाई है, जो लोकतांत्रिक अभ्यास के दायरे में आता है। हालांकि, आंदोलन का स्वरूप, भाषा और शैली भविष्य की राजनीतिक स्थिरता को प्रभावित कर सकती है। यदि प्रतिवाद शांतिपूर्ण और संस्थागत मर्यादा के भीतर रहता है, तो यह लोकतंत्र को मजबूत करेगा; लेकिन यदि यह टकराव और मुठभेड़ की ओर बढ़ता है, तो यह पूरी व्यवस्था को अस्थिर कर सकता है।
इस संदर्भ में तुरंत यह निष्कर्ष निकालना कि “देश मुठभेड़ की ओर बढ़ रहा है” एक जल्दबाजी होगी। लेकिन जोखिम के संकेतों को नजरअंदाज करना भी समझदारी नहीं है। नेपाल का राजनीतिक इतिहास बताता है कि जब सत्ता और विपक्ष के बीच अविश्वास चरम पर पहुँचता है, तब छोटी घटनाएँ भी बड़े संकट का रूप ले सकती हैं।
बालेन सरकार के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती विश्वास का पुनर्निर्माण है। सरकार नई है, जनअपेक्षाएँ ऊँची हैं और राजनीतिक वातावरण संवेदनशील है। ऐसे में हर कदम एक संदेश देता है, या तो कानून के शासन के प्रति प्रतिबद्धता का, या फिर शक्ति प्रदर्शन की प्रवृत्ति का। गिरफ्तारी जैसे कठोर कदम यदि स्पष्ट कानूनी आधार, प्रमाण और पारदर्शिता के साथ प्रस्तुत नहीं किए गए, तो “दमन” का आरोप और अधिक गहरा हो सकता है।
इसी प्रकार, एमाले के लिए भी यह आत्ममंथन का समय है। केवल सड़क आंदोलन से दीर्घकालिक राजनीतिक लाभ सुनिश्चित नहीं होता। अपने मुद्दों को तथ्य, कानूनी आधार और जनविश्वास में रूपांतरित करने पर ही प्रतिवाद प्रभावी बनता है। अन्यथा, आंदोलन स्वयं एक राजनीतिक रणनीति भर बनकर रह सकता है।
अंततः, वर्तमान परिस्थिति सरकार और विपक्ष दोनों के लिए एक अवसर भी है, अपने राजनीतिक संस्कार को प्रदर्शित करने का अवसर। सरकार के लिए कानून के शासन की विश्वसनीयता सिद्ध करने का, और विपक्ष के लिए लोकतांत्रिक मर्यादा के भीतर असहमति व्यक्त करने का। यदि दोनों पक्ष संयम खो देते हैं, तो इसकी कीमत केवल वे ही नहीं, बल्कि पूरा देश चुकाएगा।
नेपाल आज फिर एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहाँ निर्णय केवल तात्कालिक राजनीतिक लाभ के लिए नहीं, बल्कि दीर्घकालिक संस्थागत स्थिरता के लिए लेने होंगे। हड़बड़ी, आरोप और प्रतिवाद के इस दौर में सबसे अधिक आवश्यकता है- संयम, पारदर्शिता और संवाद।

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