काठमांडू(नेत्र बिक्रम बिमली): नेपाल में पिछले साल सेप्टेम्बर ८ र ९ तारिखमा भएको( भदौ २३ और २४) को हुई व्यापक हिंसा और जनधन की क्षति के मामले में गठित ‘कार्की आयोग’ की रिपोर्ट सार्वजनिक होते ही देश की राजनीति में भूचाल आ गया है। पूर्व न्यायाधीश गौरी बहादुर कार्की के नेतृत्व वाले उच्चस्तरीय जाँच आयोग ने अपनी रिपोर्ट में तत्कालीन सत्ता पक्ष और सुरक्षा निकायों पर ‘गंभीर लापरवाही’ और ‘आपराधिक चूक’ के आरोप लगाए हैं।
प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के खिलाफ ‘कठोर’ कार्रवाई
आयोग ने अपनी विस्तृत रिपोर्ट में कहा है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और गृहमंत्री रमेश लेखक उस समय की भयावह स्थिति को संभालने में पूरी तरह विफल रहे।
चेतावनी की अनदेखी: रिपोर्ट के अनुसार, खुफिया विभाग ने भदौ २३ की सुबह ही संभावित खतरे के बारे में प्रधानमंत्री को सूचित कर दिया था। लेकिन उन्होंने न तो सुरक्षा परिषद की आपात बैठक बुलाई और न ही समय रहते सेना के परिचालन का आदेश दिया।
आपराधिक दायित्व: आयोग ने प्रधानमंत्री ओली, गृहमंत्री लेखक और तत्कालीन आईजीपी चंद्र कुबेर खापुंग के खिलाफ ‘आपराधिक दायित्व’ के तहत ३ से १० साल की कैद और १ लाख रुपये जुर्माने की सिफारिश की है।
नेपाली सेना की ‘शंकास्पद’ और ‘दर्शक’ भूमिका
रिपोर्ट का सबसे विवादित हिस्सा नेपाली सेना पर केंद्रित है। आयोग ने सिंहदरबार और शीतल निवास जैसे अति-संवेदनशील क्षेत्रों में तैनात सेना की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
“जब प्रदर्शनकारी सिंहदरबार के द्वार तक पहुँच गए थे, तब वहां तैनात सेना सक्रिय होने के बजाय केवल मूकदर्शक बनी रही। आयोग का मानना है कि यदि सेना को सुरक्षा की अग्रिम पंक्ति में तैनात किया जाता, तो इतने बड़े पैमाने पर जनधन की क्षति को रोका जा सकता था।”
सुरक्षा एजेंसियों के बीच समन्वय का अभाव
आयोग ने केवल राजनेताओं को ही नहीं, बल्कि प्रशासनिक अधिकारियों को भी निशाने पर लिया है।
खुफिया विफलता: राष्ट्रीय अनुसंधान विभाग के प्रमुख हुतराज थापा और तत्कालीन गृह सचिव गोकर्णमणि दवाड़ी को सूचना के गलत विश्लेषण और सुरक्षा तंत्र को सक्रिय न करने का दोषी पाया गया है।
सशस्त्र पुलिस की भूमिका: सशस्त्र प्रहरी बल (एपीएफ) के महानिरीक्षक राजू अर्याल पर भी कार्ययोजना बनाने में विफल रहने के कारण कार्रवाई की सिफ़ारिश की गई है।









