देवेन्द्र के. ढुङगाना
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का प्रस्तावित चीन दौरा केवल दो महाशक्तियों के बीच की एक औपचारिक कूटनीतिक घटना नहीं है, बल्कि यह बदलते वैश्विक राजनीतिक संतुलन का संकेत भी है। पश्चिम एशिया में युद्ध के बादल मंडरा रहे हैं, यूक्रेन संकट अभी तक पूरी तरह सुलझा नहीं है, और वैश्विक अर्थव्यवस्था अनिश्चितताओं से गुजर रही है—ऐसे समय में ट्रम्प–शी मुलाकात को आशा और आशंका, दोनों दृष्टियों से देखा जा रहा है। इस संवेदनशील क्षण में होने वाली यह यात्रा न केवल विश्व राजनीति पर, बल्कि छोटे और विकासशील देशों—विशेषकर नेपाल—पर भी गहरा प्रभाव डाल सकती है।
अमेरिका और चीन के बीच संबंध पिछले कुछ वर्षों से प्रतिस्पर्धा, अविश्वास और रणनीतिक टकराव से भरे रहे हैं। व्यापार युद्ध, तकनीकी प्रतिस्पर्धा, ताइवान मुद्दा और दक्षिण चीन सागर के विवादों ने दोनों देशों के रिश्तों को तनावपूर्ण बना दिया है। फिर भी, यह वास्तविकता भी उतनी ही मजबूत है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था की रीढ़ यही दो देश हैं, इसलिए उनके बीच पूर्ण टकराव संभव नहीं है। इसी संदर्भ में ट्रम्प के चीन दौरे को “प्रतिस्पर्धा के बीच सहयोग” की तलाश के रूप में देखा जा रहा है।
फ्रांस की राजधानी पेरिस में हुई आर्थिक और व्यापार वार्ताओं ने भी यही संकेत दिया है—दोनों पक्ष अपने-अपने रणनीतिक हितों को सुरक्षित रखते हुए सह-अस्तित्व का रास्ता खोज रहे हैं। यदि इस दौरे से व्यापारिक समझौते, तकनीकी सहयोग या भू-राजनीतिक समझदारी का कोई नया ढांचा बनता है, तो इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था को कुछ हद तक स्थिरता मिल सकती है।
अब सवाल उठता है—इससे नेपाल को क्या मिलेगा? या क्या खोना पड़ सकता है?
नेपाल जैसा छोटा, भू-आवेष्ठित और विकासशील देश विश्व शक्तियों के प्रभाव से अलग नहीं रह सकता। बल्कि, उसे इन्हीं शक्ति-संतुलनों के बीच अपनी कूटनीतिक संतुलन बनाए रखने की चुनौती का सामना करना पड़ता है। यदि अमेरिका और चीन के संबंध सुधार की दिशा में आगे बढ़ते हैं, तो नेपाल के लिए अवसर और सहजता दोनों बढ़ सकते हैं।
पहला, आर्थिक पक्ष: नेपाल ने चीन के साथ बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बिआरआई) के तहत बुनियादी ढांचा विकास की उम्मीदें रखी हैं, जबकि अमेरिका के साथ एमसीसी जैसे परियोजनाओं के माध्यम से विकास सहयोग को आगे बढ़ाया है। यदि अमेरिका–चीन संबंध सुधरते हैं, तो इन परियोजनाओं के बीच का टकराव कम हो सकता है। नेपाल को “एक को चुनने” के दबाव से कुछ राहत मिल सकती है।
दूसरा, कूटनीतिक स्वतंत्रता: नेपाल लंबे समय से “संतुलित विदेश नीति” की बात करता आया है। लेकिन व्यवहार में महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा ने कई बार उसे असहज स्थिति में डाल दिया है। यदि ट्रम्प–शी वार्ता प्रतिस्पर्धा को नियंत्रित करती है, तो नेपाल अपनी स्वतंत्र कूटनीतिक पहचान को और मजबूत कर सकता है।
तीसरा, क्षेत्रीय स्थिरता: पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और वैश्विक तनाव का असर श्रम बाजार, तेल की कीमतों और आपूर्ति श्रृंखलाओं पर पड़ रहा है। इसका सीधा प्रभाव नेपाली अर्थव्यवस्था पर पड़ता है—विशेषकर उसकी विदेशी रोजगार और आयात पर निर्भर संरचना पर। यदि अमेरिका–चीन सहयोग से वैश्विक तनाव कम होता है, तो इसका सकारात्मक प्रभाव नेपाल पर भी पड़ सकता है।
हालांकि, इसके साथ जोखिम भी कम नहीं हैं।
यदि यह दौरा केवल एक रणनीतिक “रीसेट” नहीं, बल्कि किसी नए शक्ति-संतुलन की शुरुआत है, तो छोटे देशों के लिए नीति-निर्धारण और जटिल हो सकता है। उदाहरण के लिए, यदि अमेरिका और चीन के बीच प्रभाव क्षेत्रों का कोई मौन विभाजन होता है, तो नेपाल जैसे देशों पर “प्रभाव क्षेत्र” का दबाव बढ़ सकता है। ऐसी स्थिति में नेपाल की स्वतंत्र निर्णय क्षमता कमजोर हो सकती है।
इसी तरह, नेपाल की आंतरिक राजनीति भी ऐसे अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों से प्रभावित होती है। नेपाल के राजनीतिक दल अक्सर बाहरी शक्तियों के साथ निकटता के आधार पर एक-दूसरे पर आरोप लगाते रहे हैं। यदि अमेरिका–चीन संबंधों में नया मोड़ आता है, तो नेपाल की राजनीति में ध्रुवीकरण का स्वरूप भी बदल सकता है। “अमेरिका समर्थक” और “चीन समर्थक” जैसी पुरानी बहसें नए संदर्भ में फिर से उभर सकती हैं।
इसलिए, नेपाल के लिए मूल प्रश्न यही है—क्या हम अपने राष्ट्रीय हित को केंद्र में रखकर निर्णय लेने में सक्षम हैं?
ट्रम्प–शी मुलाकात विश्व को जिस भी दिशा में ले जाए, नेपाल को अपने दीर्घकालिक हित, आर्थिक आत्मनिर्भरता और कूटनीतिक संतुलन को प्राथमिकता देनी होगी। “संतुलन” केवल नारे तक सीमित न रहकर व्यवहार में दिखना चाहिए। विकास साझेदारी को राजनीतिक रंग देने के बजाय व्यावहारिक लाभ और पारदर्शिता पर ध्यान केंद्रित करना आवश्यक है।
अंततः, विश्व राजनीति भले ही शक्तिशाली देशों का खेल लगे, लेकिन यह छोटे राष्ट्रों को अवसर भी देती है—यदि वे दूरदर्शिता, स्पष्ट सोच और मजबूत नेतृत्व दिखा सकें। ट्रम्प का चीन दौरा भी ऐसा ही एक अवसर है—नेपाल के लिए अपनी कूटनीतिक परिपक्वता साबित करने का समय।
विश्व मंच पर चल रहा यह नया संवाद शांति, सहयोग और सह-अस्तित्व का नया अध्याय खोले—यह केवल कामना ही नहीं, बल्कि उससे लाभ उठाने की रणनीति बनाना आज के नेपाल की सबसे बड़ी आवश्यकता है।










