स्यालम्याण्डर इम्प्रिन्ट्स द्वारा ‘ए लेगेसी ऑफ सरो’ का लोकार्पण

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सिलिगुड़ी: वरिष्ठ लेखिका एवं पत्रकार शारदा छेत्री द्वारा लिखित उपन्यास ‘ए लेगेसी ऑफ सरो – ए स्टोरी फ्रॉम दार्जिलिंग’ का औपचारिक लोकार्पण २२ फरवरी, २०२६ को सिलिगुड़ी स्थित किताब कैफे में सम्पन्न हुआ।
यह पुस्तक बुक-एंट पब्लिकेशन हाउस की इकाई स्यालम्याण्डर इम्प्रिन्ट्स द्वारा प्रकाशित की गई है।
‘ए लेगेसी ऑफ सरो’ दार्जिलिंग पहाड़ की तीन महिलाओं की कहानी है, जो तीन दशकों तक अपने दर्द और क्षतिबोध को ढोती रहती हैं और वर्ष २०१७ के जून से सितंबर तक रमणीय पहाड़ी नगर को प्रभावित करने वाले गोरखालैंड आंदोलन में पुनः शामिल हो जाती हैं। यह कथा क्षेत्रीय सीमाओं से कहीं आगे तक गूंजती है। यह पहचान, स्वत्व और पीढ़ियों से हस्तांतरित स्मृतियों के प्रश्नों से जूझ रहे सभी लोगों को संबोधित करती है। यह पुस्तक स्मृति की कोमलता और पीड़ा की अमिट विरासत पर गहन एवं चिंतनशील मनन प्रस्तुत करती है। गोरखालैंड आंदोलन पर अनेक लोगों ने अनुभव, विचार और लेखन किया है, किंतु यह उपन्यास कथा को और अधिक भावनात्मक तथा ऐतिहासिक गहराई तक ले जाता है। लेखिका की शैली शांत, प्रवाहमयी और गहरी अंतर्दृष्टि से समृद्ध है।
कार्यक्रम में लेखिका एवं पत्रकार अनुराधा शर्मा के साथ एक रोचक संवाद सत्र आयोजित हुआ। अपनी कृति पर बोलते हुए शारदा छेत्री ने कहा, “यह पुस्तक नेपाली जातीय पहचान और भारतीय राष्ट्रीय पहचान के बीच संतुलन खोजते समय हमें निरंतर सहनी पड़ने वाली मूल्यांकन की पीड़ा को संबोधित करने का प्रयास है। राज्य की खोज के भीतर धधकती, न बुझने वाली राख में सुलगते अंगारों की तरह ‘अस्तित्व’ और ‘स्वत्व’ का संघर्ष इसमें प्रतिबिंबित हुआ है। हम उन अंगारों को अपने दुःख की विरासत के रूप में ढो रहे हैं।”
उन्होंने स्पष्ट किया कि यद्यपि कथा महिला पात्रों पर केंद्रित है, फिर भी इसे केवल नारीवादी आख्यान तक सीमित करना उचित नहीं होगा। यह लैंगिक सीमाओं से परे जाकर मानवीय क्षति, पहचान और संघर्षशीलता के अनुभवों की पड़ताल करती है। उन्होंने यह भी बताया कि उपन्यास की शैली मनोवैज्ञानिक अनुसंधान से प्रभावित है, जिसके अनुसार व्यक्तिगत या सामूहिक आघात अगली पीढ़ियों तक भी स्थानांतरित हो सकता है। यह कृति विज्ञान, मानवशास्त्र, इतिहास और राजनीति विज्ञान की अवधारणाओं के साथ अंतर्विषयक संवाद स्थापित करते हुए स्मृति, पहचान और विरासत में मिली पीड़ा का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करती है।
स्वागत भाषण में बुक-एंट पब्लिकेशन हाउस के निदेशक राजा पुनियानी ने कहा, “स्यालम्याण्डर इम्प्रिन्ट्स गहरे विषयों और गंभीर ऐतिहासिक संदर्भों से जुड़ी स्थानीय हिमालयी कथाओं पर केंद्रित है। इस क्षेत्र में पारंपरिक प्रकाशन की परंपरा को पुनर्जीवित और सुदृढ़ करने के उद्देश्य से हमने यह पहल शुरू की है।”


पुनियानी ने जानकारी दी कि पुस्तक बुक-एंट की आधिकारिक ई-कॉमर्स वेबसाइट तथा अमेज़न इंडिया पर खरीद के लिए उपलब्ध है। शीघ्र ही यह हमारी किताबघर सहित अन्य प्रमुख पुस्तक दुकानों में भी उपलब्ध कराई जाएगी।
पुस्तक का औपचारिक लोकार्पण पूर्ण अधिकारी, डॉ. धनी राज छेत्री, ईबी ईश्वरन, राजा पुनियानी तथा स्वयं शारदा छेत्री ने संयुक्त रूप से किया। लेखिका को स्यालम्याण्डर इम्प्रिन्ट्स द्वारा सम्मानित भी किया गया। कार्यक्रम का संचालन बुक-एंट के संपादक, पूर्व पत्रकार, लेखक एवं अनुवादक विश्व योंजन ने किया। कार्यक्रम में मिलन रुचाल, डॉ. विधान गोले, सुब्रत दत्ता, सेबंती घोष, मंदीरा घिसिंग, प्रीति ब्राह्मिण, लतिका जोशी, लेखा राय और लक्ष्मण दाहाल सहित समाज के अनेक विशिष्ट व्यक्तित्व उपस्थित थे।
समारोह में प्रख्यात लेखक डॉ. सत्यदीप एस. छेत्री ने भी अपने वक्तव्य में जनआकांक्षाओं के व्यापक संदर्भ में कहानियाँ लिखे जाने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा, “‘ए लेगेसी ऑफ सरो’ का प्रकाशन दार्जिलिंग पहाड़ और इसके बाहर भी एक महत्वपूर्ण साहित्यिक क्षण का संकेत देता है, जो स्मृति, पहचान और इतिहास को दुर्लभ संवेदनशीलता और गहराई के साथ प्रस्तुत करता है।”

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