भारत का एकमात्र गांव जिसे है राष्ट्रिय झण्डा बनाने का अधिकार, यहां तिरंगे की हर सिलाई में बसता है देश का सम्मान

indian-flag

कोलकाता: गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस या किसी भी राष्ट्रीय पर्व के मौके पर सड़क किनारे भारत का तिरंगा झंडा बिकते हुए दिखता है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि भारत में राष्ट्रीय ध्वज को आधिकारिक रूप से बनाने का अधिकार केवल एक ही जगह को मिला है। आज हम आपको उसी गांव से मिलवाने जा रहे हैं, जहां देश की पहचान कपड़े में बुनी जाती है।
चमक-दमक से दूर, भारत का यह छोटा-सा गांव उस झंडे को सिलने में गर्व महसूस करता है, जिसे देश के इतिहास और सम्मान का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है। यह गांव भले ही शांत और साधारण दिखता हो, लेकिन राष्ट्रीय ध्वज के निर्माण में इसकी भूमिका ऐतिहासिक और अनोखी है। यही भारत का एकमात्र ऐसा गांव है, जहां भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) से प्रमाणित राष्ट्रीय ध्वज बनाया जाता है।
बेंगरी, कर्नाटक के हुबली-धारवाड़ क्षेत्र में स्थित है। आकार में छोटा होने के बावजूद, भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के निर्माण अधिकारों के कारण इस गांव को पूरे देश में विशेष पहचान मिली है। बेंगरी में कर्नाटक खादी ग्रामोद्योग संयुक्त संघ (केकेजीएसएस) स्थित है। यही संस्था है जिसे भारत सरकार और बीआईएस ने राष्ट्रीय ध्वज के निर्माण के लिए आधिकारिक रूप से अधिकृत किया है। यहां बनाए जाने वाले सभी तिरंगे खादी के कपड़े से ही तैयार किए जाते हैं और ध्वज संहिता के हर नियम का सख्ती से पालन किया जाता है।


बेंगरी में राष्ट्रीय ध्वज बनाने का काम साल १९५७ से लगातार जारी है। हर साल यहां हजारों तिरंगे तैयार किए जाते हैं, जिनका इस्तेमाल सरकारी भवनों, सैन्य प्रतिष्ठानों, स्कूलों और राष्ट्रीय आयोजनों में होता है। स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस जैसे बड़े अवसरों पर यह गांव दिन-रात काम करके देशभर की मांग पूरी करता है।
इस काम से बेंगरी के सैकड़ों स्थानीय कारीगरों को रोजगार मिलता है। ध्वज निर्माण न सिर्फ आजीविका का साधन है, बल्कि गांव के लोगों के लिए यह राष्ट्रसेवा का एक माध्यम भी है। यहां हर सिलाई के साथ यह ध्यान रखा जाता है कि तिरंगे की गरिमा और सम्मान में कोई कमी न आए।
भारतीय राष्ट्रीय ध्वज हर भारतीय के लिए एकता, स्वतंत्रता और गौरव का प्रतीक है। इसे बनाना सिर्फ कपड़े जोड़ना नहीं बल्कि संविधान और देश की आत्मा का सम्मान करना है। यही वजह है कि इसके निर्माण की प्रक्रिया बेहद विशेष होती है और यह कई कड़े नियमों और मानकों से नियंत्रित की जाती है।
बेंगरी की कहानी हमें याद दिलाती है कि देशभक्ति हमेशा बड़े मंच या भाषणों से नहीं दिखाई देती। कभी-कभी वह एक छोटे से गांव में, शांत माहौल में, तिरंगे की हर सिलाई के साथ चुपचाप अपना रूप लेती है।

About Author

Advertisement