बांग्लादेश में बीएनपी की जीत पर ओली और प्रचंड क्यों उत्साहित हैं?

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भद्रपुर: छात्र आंदोलन के लगभग डेढ़ साल बाद बांग्लादेश में हाल ही में आम चुनाव हुए। चुनाव में कुल ३०० में से २१२ सीटें जीतकर बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) विजयी हुई। यह दो-तिहाई से अधिक सीटें हैं।
बांग्लादेश के चुनावी नतीजों को लेकर नेपाल के राजनीतिक गलियारों में भी काफी चर्चा हो रही है। बांग्लादेश में आंदोलन के बल पर हुए चुनाव से पुरानी शक्तियां उभरने के बाद नेपाल के पुराने दल नेपाली कांग्रेस, नेकपा एमाले, नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (नेकपा) आदि उत्साहित होने लगा है l
फरबरी १५ झापा पहुंचे एमाले अध्यक्ष केपी शर्मा ओली ने दावा किया था कि नेपाल में भी बांग्लादेश जैसी चुनावी स्थिति होगी। बांग्लादेश में आंदोलन से उभरी पार्टी को केवल ६ सीटें मिली हैं। ओली इस बात से उत्साहित दिखे कि चुनाव में पुरानी पार्टी मजबूत होकर आई है।
फरबरी १४रुकुम पूर्व के चुनबांग में आयोजित कार्यक्रम में नेकपा के संयोजक पुष्पकमल दाहाल प्रचंड ने भी नेपाल में बांग्लादेश जैसी स्थिति होने की राय व्यक्त की थी। उन्होंने जोर देकर कहा कि बांग्लादेश के चुनाव ने यह संदेश दिया है कि जनता ने आगजनी और हिंसक गतिविधियां फैलाने वालों को अस्वीकार कर दिया है, और दावा किया कि नेपाल में भी चुनावी परिणाम ऐसे ही आएंगे। प्रचंड ने कहा कि सोशल मीडिया पर लोकप्रिय होने से चुनाव नहीं जीता जा सकता और उदाहरण दिया कि ७५ लाख फॉलोअर्स वाले व्यक्ति भी हार गए।
जनमत पार्टी के अध्यक्ष डा. सीके राउत ने भी कहा कि बांग्लादेश के मतदाताओं ने विध्वंस मचाकर राजनीति में स्थापित होने आए युवाओं को अस्वीकार कर दिया। उनका कहना था कि लोकप्रियता का प्रदर्शन करने वाली पार्टियों का हश्र भारत और थाईलैंड में भी ऐसा ही हुआ है।
‘अब नेपाल में भी मार्च ५गते का चुनाव देश को जलाने, लूटने और ठगने वाले सिद्धांतविहीन, नैतिकताविहीन, संघवाद विरोधी और मधेस विरोधी दलों का सफाया करना निश्चित है,’ उन्होंने कहा।
बीएनपी बांग्लादेश की पुरानी पार्टी है, लेकिन इसने जुलाई क्रांति का समर्थन किया था। आंदोलन का नेतृत्व करने वाले कुछ छात्रों द्वारा बनाई गई नेशनल सिटीजन्स पार्टी (एनसीपी) ने इस्लामी दल जमात-ए-इस्लामी के साथ गठबंधन करने के बावजूद केवल ६ सीटें जीती हैं।
बीएनपी ४७ साल पुरानी पार्टी है। उस पार्टी ने चार बार सरकार का नेतृत्व किया है। शेख हसीना के नेतृत्व वाली अवामी लीग और खालिदा जिया के नेतृत्व वाली बीएनपी के बीच शुरू से ही प्रतिस्पर्धा रही है। टिप्पणी की जा रही है कि बांग्लादेश में अभी भी वही स्थिति आई है। बांग्लादेश में लंबे समय तक इन दोनों दलों ने बारी-बारी से नेतृत्व किया है।
२०२४ में छात्र आंदोलन के दौरान अवामी लीग की शेख हसीना के नेतृत्व वाली सरकार थी। छात्र आंदोलन के कारण न केवल शेख हसीना के नेतृत्व वाली सरकार गिरी, बल्कि हसीना को देश छोड़कर भागना पड़ा। अभी वह भारत में शरण लिए हुए हैं।
बीएनपी का छात्र आंदोलन को पूर्ण समर्थन था, जो नेपाल में जेनजी आंदोलन को राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी द्वारा दिए गए समर्थन जैसा है।
अवामी लीग पार्टी को चुनाव में भाग लेने पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। इसलिए शेख हसीना ने चुनाव परिणामों पर सवाल उठाया है।
बीएनपी और अवामी लीग के बीच मौलिक अंतर नहीं दिखता है। अंतर इतना है कि इस बार बीएनपी का नेतृत्व नए नेता तारिक रहमान के हाथ में है। वह पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के बेटे हैं। लेकिन तारिक पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं। टिप्पणी की जा रही है कि मां के प्रधानमंत्री रहते उन्होंने इसका गलत फायदा उठाया। खालिदा जिया का कुछ महीने पहले निधन हो गया था। संसद में दो-तिहाई सीटों के साथ तारिक बांग्लादेश के नए प्रधानमंत्री बन चुके हैं।
बांग्लादेश में पुरानी पार्टी के जीतकर आने पर नेपाल में क्या होगा?
अंतर्राष्ट्रीय मामलों के जानकार और नेपाल इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल को-ऑपरेशन एंड एंगेजमेंट के अनुसंधान निदेशक प्रमोद जायसवाल कहते हैं, ‘नेपाल में बांग्लादेश जैसी चुनावी नतीजे नहीं आएंगे, क्योंकि दोनों देशों की चुनाव प्रणाली अलग होने के कारण नतीजे समान नहीं आएंगे।’
जायसवाल बताते हैं कि बांग्लादेश में आनुपातिक चुनाव प्रणाली की व्यवस्था नहीं है, वहां केवल प्रत्यक्ष प्रणाली में चुनाव होते हैं। नेपाल में प्रत्यक्ष और आनुपातिक दोनों होने के कारण चुनाव परिणाम बांग्लादेश की तुलना में स्वतः अलग आएंगे। ‘इस बार के चुनाव में रास्वपा को सबसे अधिक आनुपातिक वोट मिलेंगे, गत चुनाव में एमाले को जितने आनुपातिक वोट मिले थे, उससे पांच प्रतिशत अधिक वोट रास्वपा को मिलेंगे,’ उनका आकलन है, ‘उस हिसाब से रास्वपा के बड़ी पार्टी बनने की संभावना है।‘
दूसरी बात, बांग्लादेश में हमेशा अवामी लीग और बीएनपी के बीच ही प्रतिस्पर्धा होती रही है। इससे पहले अवामी लीग सरकार ने बीएनपी पर प्रतिबंध लगा दिया था। जिसके कारण पिछली बार के चुनाव में अवामी लीग बड़ी पार्टी बनकर आई थी। इस बार के चुनाव में अवामी लीग पर प्रतिबंध लगने के कारण बीएनपी बड़ी पार्टी बनकर आई है।
पूर्व राजदूत टंक कार्की का विश्लेषण थोड़ा अलग है। ‘बांग्लादेश की जनता ने अतिवाद के विरुद्ध मतदान किया है। यह नहीं कहा जा सकता कि नेपाल में वैसी ही स्थिति नहीं आएगी,’ वे कहते हैं, ‘जेनजी आंदोलन के नाम पर नेपाल में भी अतिवाद का विकास हो रहा है, जो देश के लिए एक बुरा संकेत है। आंदोलन के नाम पर जो घुसपैठ हुई है, उसे चुनाव ही रोकेगा और संभवतः बांग्लादेश और थाईलैंड जैसा चुनावी परिणाम नेपाल में भी आ सकता है।‘
थाईलैंड में हाल ही में हुए आम चुनाव में भी बांग्लादेश जैसी स्थिति देखी गई थी। सोशल मीडिया पर अत्यधिक लोकप्रिय दिखने वाली प्रगतिशील राजनीतिक शक्ति अंततः कुछ सीटों तक ही सीमित रह गई। प्रधानमंत्री अनुथिन चार्नविराकुल के नेतृत्व वाली भूमिजाइथाई पार्टी ने उल्लेखनीय सफलता हासिल करते हुए निर्णायक शक्ति बन गई।
प्रगतिशील पार्टी (पीपुल्स पार्टी) केवल शहरी क्षेत्रों तक सीमित रही। ग्रामीण मतदाताओं ने पीपुल्स पार्टी पर भरोसा नहीं किया। यह पार्टी चुनाव में दूसरे स्थान पर सीमित रही, जबकि फ्यू थाई पार्टी तीसरे स्थान पर रही। पूर्व राजदूत कार्की बताते हैं कि थाईलैंड और बांग्लादेश के चुनाव एक साझा राजनीतिक प्रवृत्ति दिखाते हैं।

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