नई दिल्लीः उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति को केवल पूछताछ के उद्देश्य से गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने कहा कि गिरफ्तारी पुलिस अधिकारी का वैधानिक विवेकाधिकार है, न कि अनिवार्य कार्रवाई।
न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और एन.के. सिंह की पीठ ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएस, २०२३) के प्रावधानों की व्याख्या करते हुए कहा कि गिरफ्तारी की शक्ति का प्रयोग सख्त वस्तुनिष्ठ आवश्यकता के आधार पर होना चाहिए, न कि पुलिस की सुविधा के अनुसार। पीठ ने कहा कि सात वर्ष तक की सजा वाले अपराधों में भी तब तक गिरफ्तारी नहीं की जानी चाहिए, जब तक बिना हिरासत के जांच प्रभावी ढंग से आगे न बढ़ सके।
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि बीएनएस की धारा ३५(३) के तहत नोटिस जारी करना सामान्य नियम है, जबकि गिरफ्तारी अपवाद। पुलिस अधिकारी को गिरफ्तारी से पहले यह आत्ममंथन करना होगा कि क्या यह वास्तव में आवश्यक है।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश के विरुद्ध दायर अपील पर सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने कहा कि जांच गिरफ्तारी के बिना भी जारी रह सकती है और गिरफ्तारी केवल तभी की जानी चाहिए, जब कानून में निर्धारित शर्तें पूरी होती हों।
न्यायालय ने जोर देकर कहा कि गिरफ्तारी जांच को आगे बढ़ाने का एक साधन है, न कि स्वतः अपनाई जाने वाली प्रक्रिया।











